डॉ. दुर्गा चरण मिश्र
बड़े गौर से सुन रहा था जमाना
तुम्हीं सो गए दास्तो कहते-कहते।
कई दिनों से मेरे मन मानस में यह पंक्तियों गूंजती रही है और नेत्रों के समक्ष विनम्र, हसमुख, शिष्ट, मझोला कद, गौरवर्ण, शोभन व्यक्ति, अधिवक्ता, आधुनिक वेशभूषा, परिपक्व आयु के दो बार कानपुर वार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे सरलता की प्रतिमूर्ति वाक शक्ति का लोहा मनवाने वाले, कानपुर के प्रतिपिश फौजदारी अधिवक्ता जिनकी हिन्दी निष्ठा ने महानगर की कचहरी को हिन्दी मय बनाने के सार्थक प्रयास करने वाले, शिष्टाचार और सद्व्यवहार से लोगों के हृदय में स्थान बनाने वाले, सद्गुणी सेवा भावना से अनुप्राणिक स्वरूप को ही जग में सुरेन्द्र प्रताप सिंह के नाम से जाना जाता रहा है।
हमीरपुर (उ.प्र.) के पन्दरी ग्राम निवासी पूर्व कोतवाल श्री बेनी माधव सिंह के पुत्र रूप में जन्मे एम.ए एल.एल-बी. की शिक्षा प्राप्त कर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने वर्ष 1973 में कानपुर कचहरी में अपनी वकालत का शुभारम्भ किया। अपनी प्रतिमा श्रम और आत्म विश्वास के बल पर प्रगति पथ पर अग्रसर हो समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त की, कानपुर महानगर की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्था मानस संगम से जुड़ाव के कारण प्रबल हिन्दी समर्थक बन उन्होंने समाज में विशिष्ट स्थान बना लिया। मानस संगम के महामंत्री पद के उत्तरदायित्व को वो बड़े गरिमापूर्ण ढंग से अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक निर्वहन करते रहे। उनके निधन से सस्था का एक सुदृद स्तम्भ ढह गया।
अनेक लोगों ने स्वीकारा है कि मानस संगम से प्रेरणा प्राप्त कर अपने संस्थाओं द्वारा साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के परिचालन में विशेषज्ञता प्राप्त की है। श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने विधि प्रतिष्ठान के माध्यम से शुष्क माने जाने वाले कचतरी के वातावरण को साहित्यिक रूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिसे विधिक कार्यों में लगे व्यक्ति और कानपुर कचहरी कभी विस्मृत नहीं कर सकेंगे। कचहरी में सम्पन्न होने वाला हिन्दी दिवस समापन समारोह नगर की शान बन गया है। इतना सधा हुआ. पूर्व निर्धारित, उच्च स्तरीय समारोह अन्यत्र दुर्लम है। मंच पर न्याय मूर्ति, हिन्दी प्रेमी राजनयिक और विख्यात मनीषी सामने काले कोर्ट में सुधी ओताओं की बड़ी अनुशासित उपस्थिति दर्शकों का मन मोह लेती रही। मुझे विशिष्ट एवं वरिष्ठ कवि/साहित्यकार के रूप में तीन बार सम्मान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है। पहली बार 14 सितम्बर 1998 में जब बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री लक्ष्मी नारायण शुक्ल, दूसरी बार हिन्दी सप्ताह समापन समारोह में 17.09.2007 को मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त और जिला व्यायाधीश श्री सुभाष चन्द्र द्वारा और तीसरी बार हिन्दी पखवारा समापन समारोह में 22 सितम्बर 2018 को जनपद न्यायाधीश श्री राम कृष्ण गोयल और बिग्रेडियर श्री नवीन सिंह द्वारा सम्मानित किया गया। तीनों बार समारोह का वैदुश्य पूर्ण संचालन श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा किया गया था, जिससे तीनों समारोह भष्य एवं स्मरणीय बन गए थे। मानस सगम के वार्षिक समारोह एवं तुलसी जयंती समारोह का शुभारम्म सदैव आपकी वाणी से होता रहा।
श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ मुझे रायबरेली, जागीर, लखनऊ, कन्नौज और चार बार इटावा हिन्दी निधि के कार्यक्रमों में जाने का सुअवसर मिला। उनके पुत्रों के आशीर्वाद समारोह और पं. बदी नारायण के तिवारी के अभिनन्दन ग्रन्थ के सामग्री संकलन हेतु कई बार उनके गांधी नगर स्थिति आवास में सुस्वाद भोजन ग्रहण करने और लम्बा समय उनके सानिध्य में बिताने का अवसर मिला।
उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन (कानपुर इकाई) के मेरे मंत्रित्व काल (अध्यक्ष डा. देवर्षि शर्मा) के दोनों अधिवेशनों में मेरी भूमिका और कार्यक्रम के वह प्रशंसक रहे। एक अधिवेशन वेद गेस्ट हाउस, सिविल ताइन्स में 14.11.1999 को हुआ जिसमें, अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध गायिका श्रीमती मालिनी अवस्थी का कार्यक्रम -अद्वितीय रहा। कानपुर में शब्दावली क्लब की स्थापना की घोषणा हेतु दिल्ली से पधारे श्री ए.के. श्रीवास्तव, न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्ता और कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री कृष्ण बिहारी पाण्डेय की उपस्थिति बऔर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह के संचालन ने अत्यन्त सफल बना दिया था। दूसरा एक दिवसीय अधिवेशन 29.07.2001 को राम गेस्त हाउस, किदवई नगर में हुआ जिसमें मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति श्री वाई.एम कुद्दूसी थे। कविवर श्री गोपालदास नीरज’, डॉ. शैलनाथ चतुर्वेदी आदि की उपस्थिति में लगभग 200 साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। मनीषियों के सम्मान में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के नाम से शहर भर ने प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया गया। यह व्यवस्था नागरिकों द्वारा अत्यन्त सराही गई। डॉ. गिरिजा शंकर – त्रिवेदी (देहरादून) के संचालन में रात में कवि सम्मेलन सम्पन्न हुआ। श्रोताओं का मत था कि यह समारोह प्रदेशीय अधिवेशन के समकक्ष अत्यन्त सफल कार्यक्रम रहा। इस कार्यक्रम में श्री सिंह की टिप्पणी कि आप तो संस्था के प्रधानमंत्री है। प्रधानमंत्री के तो दस हाँथ होते हैं। मुझे अत्यन्त प्रेरणा दी।
जातिवाद आदि से दूर उनकी सत्कार भावना बड़ी प्रबल थी। उनके बस्ते से बिना चाय पिये में कभी लौटा नहीं। उनका कथन था कि मैं रहूं या न रहूं अथवा व्यस्त हूँ तो भी मेरे सहयोगियों के साथ आप चाय पान कर ही जायें।
सदैव प्रसन्न दिखने वाले सिंह साहब के अन्तर्मन की चिन्ता की काली छाया कभी-कभी झलक जाती थी। अपने पुत्रों की शादियां बिचलित करने वाली थी परन्तु अपनी विदुषी सहधर्मिणी श्रीमती उमा चौहान के साथ सहजता से सह गये। वेद गेस्ट हाउस में विशाल आशीर्वाद समारोह आयोजित कर घटना को मंगल रूप से प्रदान कर अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया था| श्रीमती उमा चौहान उन्नाव में शिक्षिका थी| नित्य अपनी कर से आती जाती और सिंह साहब कचहरी और साहित्यिक सामाजिक कार्यों में लोकप्रियता प्राप्त कर रहे थे| धार्मिक भावना से क्रोध जीवन चल रहा था कि विगत 27 अक्टूबर 2017 से श्री सिंह पर बज्राघात था। सुविज्ञ होने के कारण उनकी अन्तर्यथा प्रकट नहीं हुई परन्तु यह अन्दर से हिल गए थे|
अनेक साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं से वह सम्बद्ध थे। उ.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन इटावा हिन्दी निधि श्री संकट मोचन धाम सैलाई विकासिका मानस मण्डल साहित्य मन्दाकिनी आदि संस्थाओं ने सम्मानित कर स्वयं को गौरवान्वित किया था। मेरे संयोजकत्व में आयोजित मानस मण्डल इन्दिरा नगर में 22 अगस्त 2004 को तुलसी जयन्ती समारोह में उन्हें मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान से विभूषित कर प्रशस्ति पत्र समर्पित किया गया था जिसमे अंकित था-
कर्मनिष्ठ कर्तव्य परायण सेवा के प्रतिमान
श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह का, सब करते हैं मान।
सब करते हैं मान, आप है अद्भुत वक्ता,
मंच संचालक प्रवीण और विलक्षण अधिवक्ता ।
हिन्दी के प्रबल समर्थक सत्यनिष्ठ और धर्मशीलदूसरे दिन समाचार पत्रों ने सभी को झकझोर दिया जिसने भी पढ़ा अवाक रह गया। प्रातः 11 बजे चलकर बार एसोसिएशन में श्रद्धांजलि के पश्चात शव यात्रा शमशान घाट पहुँची। बड़ी संख्या में लोगों के पुष्पांजलि पश्चात् स्वजनों परिजनों पुरजनों एवं स्नेहीजनों के समक्ष पावन गंगा तट पर पंचतत्वों में विलीन हो गया। ज्येष्ठ पुत्र मनुराज सिंह ने मुखाग्नि दिया। कनिष्ठ पुत्र ऋतुराज सिंह सजल नेत्रों से दाह संस्कार देखते रहे।
आज श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह का पार्थिव शरीर हमारे मध्य नहीं रहा। शेष बचा है उनका सद्व्यवहार आत्मीयता और परोपकार जिसे सम्पर्क में आए लोग जीवन पर्यंत स्मरण करेंगे। उनकी पावन स्मृति को नमन कर अपनी और मानस संगम साहित्य मंदाकिनी की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि कर प्रभु से प्रार्थना है कि उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दे शोकाकुल परिवार को धैर्य प्रदान करें।
विधि प्रकोष्ठ संयोजक का जीवन है कर्मशील।
कानपुर बार एसोसिएशन के मंत्री महामंत्री एवं अध्यक्ष पदों का उत्तरदायित्व को गौरवान्वित किया। वरिष्ठ अधिवक्ता यश शेष पं. राम बालक मिश्र कहते थे सुरेन्द्र प्रताप ने एसोसिएशन की जो गरिमा बढ़ाई है वह रह सकेंगी या नहीं। श्री बीबी सिंह चन्देल एडवोकेट के मतानुसार श्री सुरेन्द प्रताप सिंह 24 वर्षों से विधि प्रतिष्ठान कानपुर के सचिव रहते हुए नगर एवं बाहर के साहित्यकारों को सम्मानित किया है वह कानपुर बार एसोसिएशन के सबसे सशक्त एवं लोकप्रिय अध्यक्ष रहे। न्याय संगत विषयों में वह अधिवक्ताओं हितों के लिए जिल जज से अपना पक्ष वृढ़ता से प्रस्तुत करते थे। वारंट जारी करने एवं अन्य विषयों में वह जिला जज श्री चौरसिया और जिला जज कानपुर देहात श्री ओझा से मिड़ अपनी मांगे मनवा अधिवक्ताओं में लोकप्रियता प्राप्त की थी|
पत्नी विक्षोह के पश्चात श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह का शरीर कई व्याधियों से ग्रस्त होता गया परन्तु बाहर से पता नहीं चलता था। अन्ततः 28 जनवरी 2020 को कचहरी में न्यायाधीश महोदय के समक्ष बहस करते हुए उनकी जिह्वा लड़खड़ाने लगी और वह निदाल हो गिर पड़े। शीघ्रातिशीघ्र हृदय रोग संस्थान पहुंचाया गया परन्तु बड़े न्यायविदों का दबाव, श्रेष्ठ चिकित्सकों का दल और मूल्यवान जीवन रक्षक औषधियां असफल सिद्ध हुई और मृत्यु ताण्डव सफल रहा। जीवन मृत्यु का खेल सभी प्रियजन असहाय से देखते रहे|
दूसरे दिन समाचार पत्रों ने सभी को झकझोर दिया जिसने भी पढ़ा अवाक रह गया। प्रातः 11 बजे चलकर बार एसोसिएशन में श्रद्धांजलि के पश्चात शव यात्रा शमशान घाट पहुंची। बड़ी संख्या में लोगों के पुष्पांजलि पश्चात् स्वजनों परिजनों पुरजनों एवं स्नेहीजनों के समक्ष पावन गंगा तट पर पंचतत्वों में विलीन हो गया। ज्येष्ठ पुत्र मनुराज सिंह ने मुखाग्नि दिया। कनिष्ठ पुत्र ऋतुराज सिंह सजल नेत्रों से दाह संस्कार देखते रहे।
आज श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह का पार्थिव शरीर हमारे मध्य नहीं रहा। शेष बचा है उनका सद्व्यवहार आत्मीयता और परोपकार जिसे सम्पर्क में आए लोग जीवन पर्यंत स्मरण करेंगे। उनकी पावन स्मृति को नमन कर अपनी और मानस संगम साहित्य मंदाकिनी की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि कर प्रभु से प्रार्थना है कि उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दे शोकाकुल परिवार को धैर्य प्रदान करें।
