कानपुर का ये बैकुंठ मंदिर उत्तर और दक्षिण भारतीय संस्कृति के अलावा हिन्दू-मुसलमानों को भी जोड़ता है| उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृति के सात्विक मेल का दर्शन करने की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना कानपुर के बैकुंठ मंदिर में पूरी हो सकती है. दक्षिण भारतीय शैली के निराले स्थापत्य और कलात्मक सुंदरता का प्रतिनिधित्व करता यह अनूठा उत्तर भारतीय मंदिर है. विशाल मंदिर में भगवान वेंकटेश, भगत वत्सल नारायण, गरुड़ जी, रंगनाथ जी, बहू देवी, श्रीदेवी, लक्ष्मी देवी और सुदर्शन जी की अष्टधातु की प्रतिमाएं हैं. दक्षिण भारतीय मंदिरों की तरह यहां भी मूर्तियों को स्पर्श करने की मनाही है. भगवान के चरणों पर रखा चांदी का एक टोप श्रद्धालुओं के सिर पर रख मंगल कामना की जाती है. मंदिर बनने के बाद से ही यहां अखंड दीपक और हवनकुंड में अखंड अग्नि प्रज्वलित है.
प्रयाग नारायण मंदिर शिवाला के नाम से मशहूर इस प्राचीन मंदिर का मुख्य द्वार लगभग 65 फुट ऊंचा है. भगवान रंगनाथ के प्रिय गरुड़ की एक विशाल प्रतिमा मंदिर के बाहर स्थापित है. इसके अलावा रामानुज संप्रदाय के चार प्रमुख आचार्यों की मूर्तियां भी यहां स्थापित हैं. दक्षिण भारत के विजय नगर काल की तरह मंदिर प्रागंण में लगभग 400 दुकानें हैं जिनमें जूते-चप्पल और मांस-मदिरा के अलावा सबकुछ मिलता है. चालीस कर्मचारियों वाले मंदिर का खर्च इन दुकानों और लगभग 250 घरों के किराए से चलता है.
मंदिर का विशेष आकर्षण बेल्जियम के अति प्राचीन महंगे झूमर हैं. मंदिर में सुबह-शाम आरती के वक्त बजाए जाने वाले नक्कारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी कम दिलचस्प नहीं है. ये विशाल नक्कारे क्रांतिकारी नानाराव पेशवा के महल के बाहर डुग्गी पीटने और ऐलान करने के काम में लाए जाते थे. 1857 के बाद जब अंग्रेज शासक इन्हें नीलाम करने लगे तो उन्हें मंदिर की नींव रखने वाले पंडित रेवती रमण तिवारी के पूर्वज महाराज दवकी रमण तिवारी ने खरीद लिया था.
दक्षिण भारतीय कारीगरों के बनाए इस मंदिर का गोपुरम देखने लायक है. इस शैली के मंदिर तमिलनाडु स्थित पल्लवों के कैलाशनाथ मंदिर पांची से प्रारंभ होते हैं. वैसे, गोपुरम को आकर्षक ढंग से विकसित करने में 14वीं शताब्दी में विजय नगर के शासक काफी आगे थे. यूं तो, मदुरै स्थित मीनाक्षी मंदिर का गोपुरम सबसे ऊंचा है लेकिन उत्तर प्रदेश में इस मंदिर के गोपुरम की ऊंचाई बाकी मंदिरों से ज्यादा है.
बैकुंठ मंदिर में पूजा दक्षिण भारतीय पद्धति के अनुसार होती है. नियम के अनुसार मंदिर के पट सुबह तभी खुलते हैं जब कोई गाय वहां आकर दरवाजे की ओर अपनी पूंछ हिलाती है. इसके बाद उसे रात में भगवान को लगाया गया भोग खिलाया जाता है. फिर शहनाई और विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ से पूजा का क्रम शुरू होता है. चार पुजारी तमिल और संस्कृत के श्लोक पाठ के साथ पांच आरती उतारते हैं. भगवान को सुबह कच्चे खाने का और शाम को पूड़ी-सब्जी का भोग लगाया जाता है. खास बात यह कि भोग के लिए यहां दो खास रसोइए नियुक्त किए गए हैं.
मंदिर में 38 उत्सव पर्व मनाए जाते हैं जिनमें माघी मेला, रामनवमी, दशहरा और बैकुंठ उत्सव मशहूर हैं. मंदिर का बैकुंठ द्वार केवल पांच दिन यानी बैकुंठ एकादशी से पूर्णमासी तक खुलता है. इन विशेष पर्वों पर सवारी निकाली जाती है. मंदिर में लगभग 50 छोटे-बड़े रथ और सिंहासन हैं. सवारी के वक्त इन सिंहासनों को भक्त कंधों पर उठाकर चलते हैं.गौरतलब है कि इस सुंदर मंदिर का सांप्रदायिक समरसता से जुड़ा एक खूबसूरत पहलू भी है. बैकुंठ मंदिर की मरम्मत और रंगाई-पुताई में मुसलमान कारीगरों की मुख्य भूमिका रहती है. इसी तरह मंदिर की ओर से बनवाए जाने वाले रामनामी दुपट्टों का काम भी मुसलमान कारीगरों के ही जिम्मे है. इसके लिए ठप्पे और कलम मंदिर की ओर से दिए जाते हैं. विशेष पर्वों पर भगवान का प्रसाद लेने के लिए ये कारीगर भी श्रद्धा के साथ कतार में खड़े होते हैं. कहा जा सकता है कि सुंदर स्थापत्य और सांस्कृतिक-समरसता के ऐसे केंद्र राज्य की असल धरोहर हैं.
