Monday, February 23, 2026

इन्द्रधनुषी रंगों को बदरंग न करें

डॉ. बद्री नारायण तिवारी

आज अपना देश अपने तीज त्योहारों को बिना जाने इस प्रकार पाश्चात्य ‘वेलेन्टाइन डे’, पैरेन्ट्स-डे ‘हैप्पी बर्थ डे’ आदि के अलावा आंग्ल वर्ष के अन्तिम दिवस 31 दिसम्बर ही सुरा सुन्दरी में डूबी रात्रि क्लबों के जश्न की अन्धी दौड़ में शामिल हो रहा है। सांस्कृतिक विकृतियों के प्रदूषण से ही ‘एड्स’ नामक भयंकर रोग का उद्भव हो चुका है।

भारत के वैभव एवं ऐश्वर्य प्रदायक पर्व के रूप में वैदिक काल से मनाये जाने वाले विभिन्न नामों जैसे-यवाग्रयन यज्ञ, नसस्येष्टि यज्ञ, फाल्गुनिका, होलिका आदि नामों से समय-समय पर प्रचलित रहा देश के कुछ प्रदेशों में गेहूँ, चना आदि की सिंकी-मुनी बालियों को होला’ कहा जाता है। इन नवान्न बालियाँ को प्रज्जवलित आग में भूनने की परम्परा अति प्राचीन है. इसी कारण होली पर्व नाम से प्रचलित हो गया भविष्य पुराण में होली को हास्य-विनोद का त्याहार कहा गया है। एक रचनाकार की रेखांकित पंक्तियों ने होली को रस, रंग माधुर्य से सराबोर आन्तरिक उल्लास के सांस्कृतिक पर्व को कितने सुन्दर शब्दों की माला में गूंथा है –

केसर के रंग वह छज्जन पै छाजन पै।
नारे पे नदी पै और निकास पे उछाल है।।
ग्वालन कवि कुंकुम की घालन रसाल पै।
तालन तमालन पै फूटल उसाल है।।
गुंजन गुलालन पै, लालन पै ग्वालन पै।
बाला-बाल बालन पै घुमऽयो गुलाब है।।

लोक संस्कृति से जुड़े होली पर्व की श्रेष्ठ व्याख्या डॉ. रामानन्द तिवारी हमारी जीवन संस्कृति में लिखतेहै- “राग-रंग और उल्लास का यह पर्व अपनी व्यापकता, स्वच्छता और सम्पन्नता में अनुपम है। अनेक विशेषताओं से युक्त वर्ग का यह अंतिम पर्व जीवन में संस्कृति के पूर्व समन्वय का द्योतक है। वैदिक यन्ना और लोकोत्सव का अद्‌भुत समन्वय इसमें मिलता है। होली के पर्व पर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर वर्ष की रागिनी नये वर्ष की रागिनी को जन्म देती है।”

भारत के बारह मासों में हर महीने का अपना अलग रंग-ढंग है। गीतों में प्रत्येक माह को एक माला में गूंथा गया जिसे ‘वारामासी गीत’ के रूप में कहा जाता है। बसंत ऋतु में जब आम के बौर आने लगते हैं-फागुन मास दस्तक देने लगता है। रचनाकारों ने वृज की होली को अपनी लेखनी की पिचकारी से श्रीकृष्ण की विभिन्न झाँकियों को इन्द्रधनुषी रंगों में रंगा है। लोक गीतों में भी मथुरा-वृन्दावन में श्री कृष्ण की होली लीला की भरमार है।

होली का रंग भरा हर्षोल्लास त्योहार बिना दशरथ नन्दन श्रीराम की होली के कैसे पूर्ण होता श्रीराममद्र मर्यादा पुरुषोत्तम होकर संसार का उद्धार करने के लिये विभिन्न अवतार धारण कर आते हैं। मानव रूप में लौकिक व्यवहार से भी राम और सीता परस्पर होली के रंग मरे सरोवर में डूब रहे हैं। होली की तरंग में सखियाँ अपने-अपने घरों से निकल कर आई और केसर, कुम-कुम रंग आदि लेकर राम जानकी के संग होली खेल रही है-

सुनि आई री आज मैं तो होली की भनक,
अपने-अपने भवन से निकसी, केसर, रंग, कुम-कुम औ कनक। खेलत राम जानकी के संग, होत मधुर पिचकारी की खनक।

अयोध्या में राम-सीता की ऐसी अलौकिक रंग भरी होली देखने हेतु अपार जन समूह उमड़ पड़ा। सखियों लक्ष्मण द्वारा रंग डालने पर उन्हें घेरकर उनकी पिचकारी छीनकर उनका सिन्दूर, काजल लगाकर सजाती है। इस उल्लास भरे वातावरण में एक ओर श्रीराम अपने सहयोगियों के साथ खड़े हैं, उनके सम्मुख सीता अपनी सखियों के साथ अबीर, गुलाल, सुगंधमय की पिचकारी भरकर होली की इन्द्रधनुषी छटा बिखेर रही है।

आज राम-सिया खेलत होरी, सखिन संग मई झकझोरी।
एक ओर राम सखा सभ ठाढ़े, एक ओर जनक किशोरी।
अबीर गुलाल, अतर पिचुकारिन, हॅसि-हँसि मार परो री।

अवधपुरी में होली के रंगोत्सव की राम और लक्ष्मण दोनों भाईयों ने धूम मचा रखी है। गली-गली में रंग की फुहारें चल रही है, अबीर, गुलाल के बादल उड़ रहे हैं। होली के रंग-रंग में डूबे मृदंग, झाँझ, उफ और मंजीरों के मधुर संगीत की लहर प्रवाहित हो उठी।

अयोध्या के कनक भवन में अपार जन समूह सीता राम के दर्शन हेतु विकल हो रहा है। इसी दृश्य से अभिभूत सीता स्वयं श्रीराम से निवेदन करती है, कि वे अयोध्या वासियों को दर्शन दें। फागुन ऋतु के ऐसे आनन्दोत्सव में फाग का भी आनन्द लें-

ताहि समय उठि जनक नंदिनी रघुनंदन डिंग जाई.
उठहु लाल फागुन सुख लूटहु दे टरसन सुखदाई।
ठाढ़ सभ जन समुदाई। फागुन की रितु आई, समे जन मोद बढ़ाई।

होली गीतों को असंख्य लोक गीतकारों ने अपनी सरस रचनाओं में लिखा है, किन्तु अनेक रचनायें चर्चित तथा जनप्रिय होने के बाद भी अनाम ही है। संभवतः अज्ञात रचनाकारों तथा ज्ञात ग्रंथकारों की भिन्नता को साहित्य के युगपुरुष माचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ग्रंथकार लक्षण “कविता सरस्वती (तन 1901) में यथार्थ चित्रण किया है। इसमें द्विवेदी जी ने स्पष्ट लिखा था, जो इस समय भी सामयिक लगता है कि ग्रंथकार अपनी पुस्तक की आलोचना अथवा विज्ञापन स्वयं ही करके पत्र-पत्रिकाओं में अन्य नाम से प्रकाशित कराते हैं-

अपने ग्रन्थों का प्रति वर्ष, विज्ञापन लिख स्वयं सहर्ष,
व्यास और बाल्मीकि तुल्य जो अपने को बतलाते हैं।
अथवा पुत्र, मित्र का नाम देकर जो निकालते काम,
अति गम्भीर ग्रन्थकारों के गुरुवर वे कहलाते हैं।।

प्राचीन कवियों में रसिक गोविन्द की चर्चित ‘लछिमन चन्द्रिका’ और ‘रसिक गोविन्दानन्द’ है। उनकी होली खेलने के वर्णन की प्रस्तुति पक्तियाँ दृष्टव्य है-

रंग भरि-भरि भिजवत मोरि अंगिया
दुइ कर लिहिस कनक पिचकरवा। हम सन ठनगन करत, डरत नहिं,
मुख सन लगवत अतर अगरवा।

होली के आगमन की पूर्व सूचना बसंत ऋतु में अब आम्र वृक्षों में बौर आने पर हो जाती है। उसी समय क सभी ओर केसर की सुगंध उड़ने लगी है तब श्री राम-लक्ष्मण के साथ भरत, शत्रुघ्न और हनुमान अपने-अपने हाथों में पिचकारी तथा कलशों में केसर जल भरकर होली खेलने आते हैं यह आनन्दमयी दृश्य भक्तों को भावविभोर कर देता है।

राम-लखन और भरत-शत्रुघ्न, संग सखा हनुमत आए,
फेर गुलाल हाथ पिचकारी, केसर कलस भरि आए।

इसी फागुन मास को कविवर यायावर जी को ‘पगलाया फागुन’ रचना की उल्हास भरा मस्ती परिपूर्ण पंक्तियों कहती है –

उपवन में उन्माद, चाँदनी हँसने लगी कनेर पर,
रंग की पिचकारी तोते ने मारी आज वटेर पर,
मौसम ने ऋतु प्रिया लजाती को बाँहों में बांध लिया,
देखा तो शरारती फागुन हँसता दिखा मुंडेर पर।

इसी मधुमास में आध्यात्मिक पक्ष की होली में निराकार ब्रह्म द्वारा होली में रंग खेलने का भी अ‌द्भुत वर्णन देखें –

एक पुरुष पुरान चहुँ युग में, मिलि आतम राम खेले होरी,
रंग लगे फागुआ, रस बरिसे हो, माया ब्रह्म दूनों जोरी।

वस्तुतः होली पर्व को राधा-कृष्ण के साथ ही समाज में अधिकांश मान्यता है। फागुन मास में फगुआ माँगने की भी प्रथा है। उसे न देने पर कितने सुन्दर शब्दों में मनमोहक गालियों दी जाती हैं –

फगुआ दे मोहन मतवारे,
ब्रज की नारी गावति गारी, तुम दो बापन बीच हो वारे।
नन्दजी गोरे, जसोदा गोरी, तुम काहे भए कारे।

पूरा व्रज क्षेत्र नन्दगाँव तथा बरसाना के कृष्ण कन्हैया और राजा जी के ल‌ट्ठ‌मार होली के दृश्य देखने को व्याकुल हो जाता है। सर्वाधिक साहित्य होली पर राधा-कृष्ण पर ही सृजन हुआ है। होली श्रृंगार का प्रतीक है, किन्तु इसी पर्व पर रामभक्त हनुमान को अयोध्या में अपने सिया राम के साथ रंग भरी होली का आनन्दोत्सव मनाते हैं, तो दूसरी ओर हनुमान अपना पूंछ में आग से लंका में लंका दहन के रूप में होलिका -वहन करते हैं। लोक गीतकारों ने हनुमान जी की होली को कितने सुन्दर शब्दों में संजोया है-

पवन तनय आजु होरी मचाई पोछि बांधि पट तेल चुवाओ पावक दीन्ह लगाई।
कुछ फांद के पुर सब जारो दस मुख हिय अकुलाई हाय-हाय लंका जराई।।

इस होली का प्रभाव देश के अंतिम मुगल शायर सम्राट बहादुर शाह जफर की निम्नांकित पंक्तियों 1857 की सशस्त क्रान्ति को जो स्वयं देखा था कितना यथार्थ चित्रण करती है-

हिन्द में कैसे फाग मस्ती जोरा-जोरी,
फूल तख्त हिन्द बना केशर कीसी क्यारी।
कैसे फूटे भाग हमारे लुट गई दुनिया सारी,
गोला में गुलाल बनायो तोप की पिचकारी।।

अंग्रेजों की जोर जबरदस्ती तथा भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों को होली में किस प्रकार सम्बद्ध किया। जन-जन में रची-बसी होली को राष्ट्रीय भावना से भरपूर जो भाव व्यक्त हुये उसी धारा को स्वतंत्रता संग्राम के राष्ट्रीय कवियों ने अंग्रेजों द्वारा खून की होली पर असंख्य रचनायें लिखकर स्वाधीनता का बिगुल फूंका। किंतु आज देश के पावन तीज-त्योहारों को वर्तमान मैकाले की दूषित शिक्षा प्रणाली और दूरदर्शन के अधिसंख्य चैनल भीषण प्रदूषण की चपेट में ला चुके हैं।

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