Monday, February 23, 2026

मेरी हिन्दी सेवा के अक्षय प्रेरणास्रोत

बद्री नारायण तिवारी

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी हिन्दी के उन साहित्यकारों में हैं जिन्होंने व्यवसाय के लिए नहीं वरन् त्यागपूर्ण निष्वा-भावना से प्रेरित होकर हिन्दी की सेवा की है। वर्तमान युग के प्रायः समस्त साहित्यकार एवं हिन्दीसेवों अनेक संपर्क में रहे हैं। आचार्य गयाप्रसाद शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सनेही और हितैषी उनके मित्र थे। निराला जी उन्हें अपना अग्रज मानते थे और अपना ‘तुलसीदास’ नामक खंड काव्य उन्होंने चतुर्वेदी जी को सन् 1938 ई. में ही समर्पित किया था।

चतुर्वेदी जी ने सन् 1916 में सबसे पहले महात्मा टल्स्टॉय की जीवनी हिन्दी में लिखी थी। उस समय वे विद्यार्थी थे। सन् 1936 में उनका ‘रत्नदीप’ काव्य संकलन प्रकाशित हुआ जिसके द्वारा वे हिन्दी जगत में कवि रूप में प्रतिष्ठित हुए। कविता में वे ‘श्रीधर’ हैं। और व्यंग्य लेखन में ‘विनोद शर्मा’ है। हास्य-व्यंग्य शैली में अपनी रचनायें वे विनोद शर्मा के नाम से करते हैं। उनकी ‘राजभजन की सिगरेट दानी’ तथा छेड़‌छाड़ महत्वपूर्ण व्यंग्य-रचना है। इस क्षेत्र में वे उस समय सबसे आगे निकल गये जब उन्होंने ‘श्री विनोद शर्मा अभिनन्दन ग्रंथ’ निकाला। जो लोग स्वयं अपना अभिनन्दन कराने के चक्कर में रहते हैं, उन पर इस ग्रंथ में तीखा व्यंग्य है।

श्री चतुर्वेदी लगभग 25 वर्षों तक सरस्वती के संपादक रहे हैं। अपने संपादन काल में उन्होंने मनोरंजक ‘संस्मरण’ का एक नया स्तम्भ चलाया था जिसमें वे स्वयं लिखते थे। ये संस्मरण पुस्तक स्वयं में दो भागों में – प्रकाशित हो चुके हैं। उनके द्वारा लिखी गई व्यंग्य-समीक्षायें भी बड़ी लोकप्रिय रही है। ‘तुलसीदास की छीछालेदर’ में उन्होंने बड़े-बड़ों की पोल खोली है।

चौरासी वर्ष की अवस्था में गतवर्ष प्रयाग में आयोजित अखिल भारतीय सारस्वत समारोह में चतुर्वेदी जी का अभिनन्दन किया गया था जिसमें देश के मूर्धन्य विद्वानों ने भाग लिया था। उक्त अवसर पर ‘हिन्दी-सेवा संकल्पना’ नाम से उसकी गद्य-पद्य रचनाओं का एक वृहद् संकलन प्रकाशित हुआ था जिसका संपादन डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने किया था। उन्होंने अपने पूज्य पिता जी श्री चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद जी की स्मृति ने ‘पुण्य-संस्मरण’ नामक ग्रंथ प्रकाशित कराया। उसी समय सरस्वती में प्रकाशित महापुरुषों की शोकावलियों का एक संग्रह ‘पावन-संस्मरण’ नाम से दिल्ली में छपा जिसमें विश्व की महान विभूतियों के जीवन एवं स्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। इनके पिताश्री ने ‘वारेन हेस्टिंग्स’ पर पुस्तक लिखने से अंग्रेजी शासन ने सरकारी सर्विस से हटा दिया था।

गतवर्ष जनवरी में दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से जिन महान हिन्दी सेवियों का सम्मान किया गया था उनमें श्री चतुर्वेदी जी प्रमुख थे। बाबू भगवती चरण वर्मा के शब्दों में वे सचमुच एक संस्था है। उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वे कर्णधार है। सनेही जी की स्मृति में प्रकाशित ‘सुकविविनोद’ नामक काव्य मासिक के वे प्रेरक और संरक्षक है। अनेक कवियों के वे गुरु हैं, कितनों के वे मित्र हैं और बहुतों को उन्ननि बनाया है। उनकी साहित्य सेवा निःस्वार्थ भाव से होती रही है। उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के उच्च पदों पर रहने के बाद वे मध्य भारत के शिक्षा संचालक नियुक्त हुए। वहां से अवकाश ग्रहण करते ही वे आकाशवाणी दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर कार्यरत हुए जहां उन्होंने हिन्दी का प्रतिष्ठित किया।

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी का व्यक्तित्व बड़ा ही महान और प्रभावशाली रहा है। यही कारण है कि अनेक साहित्यकारों ने उन्हें अपनी कृतियाँ भेंट की है जिनमें निराला जी, पं. सोहनलाल द्विवेदी, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ तथा डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक के नाम उल्लेखनीय है। श्री अज्ञेय जी ने अपना नवीनतम निबंध संग्रह ‘जोग-लिखी’ श्री चतुर्वेदी जी को समर्पित किया है। चतुर्वेदी जी बड़े गुणग्राहक हैं और अपने मित्रों तथा शिष्यों की सदैव सहायता करते हैं।

पिछले दो विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लेकर श्री चतुर्वेदी जी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान किया। अभी हाल में मॉरीशस के प्रधानमंत्री के भारत आगमन पर श्री लल्लन प्रसाद ‘व्यास’ के संयोजन में सर रामगुलाम जी की पुस्तक के विमोचन समारोह की अध्यक्षता पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी जी ने ही की थी। मॉरीशस के सम्मेलन में आप राजकीय अतिथि के रूप में आमंत्रित किए गए थे।

कानपुर के ‘मानस संगम’ समारोह के वे प्रथम उ‌द्घाटनकर्ता हैं उन्होंने समारोह को ऐतिहासिक बताया। उन्हीं की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन से यह समारोह प्रतिवर्ष होता है। पचासी वर्ष की आयु में भी वे हिन्दी सेवा हेतु सक्रिय हैं। आज भी वे त्यागपूर्ण-निष्ठा के उज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत करने में अग्रणी हैं।

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