– डॉ. बद्री नारायण तिवारी
“जिस युग में फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्रियों के इस्तेमाल किए हुए जूते और दुपट्टे सार्वजनिक चीलामी में बिकने का फैशन उपज आया हो, उसमें किसे यह जाकर देखने का समय अथवा उत्साह होगा कि कालजयी साहित्य के रचयिताओं की जन्मस्थली कहां और किस दिशा में है? क्या अभी भी वहां कहीं ऐसे लोग हैं, जो उस रचनाकार के बारे में सहज मानवीय स्मृतियाँ संजोए हुए हैं? हमारी दिग्गज साहित्य अकादमियों और भाषा-परिषदों को फूहड़ राजनीति खेलने से फुर्सत नहीं, राजकीय भाषा समितियां लगभग रबर स्टैम्प बन चुकी हैं। ऐसे माहौल में श्री शर्मा ने बहुत निःस्वार्थ प्रेम और सरोकार के साथ वह काम किया है जो हमारे तमाम बड़े-बड़े संस्थान साधन सम्पन्न होते हुए भी नहीं कर सकते हैं”। इस यथार्थ चित्रण को लिखा है विदुषी संपादक सुश्री मृणाल पाण्डे ने यायावरी-साहित्य, रेखाचित्र एवं यात्रावृतान्तों के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाने वाले डॉ. चन्द्रिका शर्मा की कृति “साहित्य निर्माताओं के गांव” की प्रस्तावना में।
मृणाल पाण्डे ने सर्वप्रथम डॉ. शर्मा के इन लेखों को अपने साप्ताहिक ‘हिन्दुस्तार’ के संपादक रूप में पर्याप्त साज-सज्जा के साथ प्रकाशित भी किया था। गांव के धूल भरे लेखनी के पहरुओं की स्मृतियों को जीवंतता प्रदान की है। इस कृति में पन्द्रह साहित्य मनीषियों के स्थानों में मुंशी प्रेमचन्द्र के “लमही” “हरिऔध” के “निजामाबाद”, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के “अगौना”, पं. प्रताप नारायण मिश्र के वैजेगांव, पं. रामनेश त्रिपाठी के “कोइरीपुर” आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के जन्मस्थान “दौलत पुर” सुकवि सम्राट गया प्रसाद शुक्ल “सनेही” के “हड़हा” महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” के गांव “गढ़ाकोला” आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी के गांव “सफीपुर” महापंडित राहुल सांकृत्यायन के ग्राम “पंदहा” अज्ञेय की जन्मभूमि ‘कुशीनगर’, कविवर नरोत्तम दास के “बाड़ी”, मलिक मोहम्मद जायसी के “जायस” और हल्दीघाटी के रचयिता श्याम नारायण पाण्डेय के गांव “डुमराव” वर वहां जाकर अपनी लेखनी चलाई है।
इस समय विश्व में हिन्दी जानने और बोलने वालों की संस्था चीनी के बाद हिन्दी दूसरे स्थान पर मानी जाती है। इसका सबसे बड़ा श्रेय दूर दृष्टा हिन्दी के युग पुरुष कहे जाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को ही है। आचार्य द्विवेदी ने समझ लिया था कि ये हिन्दी को विभिन्न क्षेत्रों में बोली जानी बोलियां एक क्षेत्र विशेष तक कहीं सीमित होकर न रह जायें। हिन्दी का विकास तभी होगा जब एक सामान्य रूप से बोली जाने बाली भाषा का स्वरूप होगा। रायबरेली जनपद के दौलत पुर गांव का एक युवा सामान्य शिक्षा ग्रहण कर जी. आर.पी. रेलवे में ‘सिग्नेलर’ का पद प्राप्त कर लेता है। किन्तु अपने अंग्रेज अधिकारी के पदाधिकारी के सम्मुख उसका स्वाभिमान उसे झुकने से रोकता है; किन्तु यह यथार्थ घटना है कि रेलवे का पदाधिकारी अच्छे वेतन की नौकरी छोड़कर बीस रुपये मासिक पर इलाहाबाद के ‘इण्डियन प्रेस’ द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका “सरस्वती” के सम्पादन का शुभारम्भ करते हैं। आचार्य द्विवेदी की हिन्दी साहित्य साधना का श्री गणेश होता है। बंगाल से आकर हिन्दी प्रेमी हरीकेश घोष ने ‘इण्डियन प्रेस’ की स्थापना कर सन् 1900 ई. में सरस्वती मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम प्रारम्भिक दस वर्षों तक नागरिक प्रचारिणी सभा’ काशी का सम्पादन उनके पदाधिकारियों के अन्तर्गत रहा। इसके पश्चात आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सम्पादन का भार ग्रहण किया।
वस्तुतः भारतेन्दुकाल तक हिन्दी गद्य लेखन तथा काव्य रचना हेतु अलग-अलग मानक अपनाये जाते थे। आचार्य द्विवेदी के शब्दों में ‘हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार का और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा का उपयोग होता है। उनके अनुसार जहाँ गद्य लेखन खड़ी बोली में होता है वहीं काव्य हेतु ब्रजभाषा का प्रयोग ही उपयुक्त समझा जाता रहा आचार्य द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ से इन दुविधा को समाप्त करते हुए खड़ी बोली में लिखने हेतु रचनाकारों को काव्य कृक्तियां भेजने पर प्रोत्साहित करते थे। इसी के फलस्वरूप हिन्दी का विशाल समुदाय खड़ी बोली में सशक्त काव्य रचना करने लगा। आचार्य द्विवेदी के प्रभा मण्डल से सम्बद्ध कवियों में खड़ी बोली के कवियों में प्रथम स्थान माना गया है किन्तु अन्य कवियों में लोचन प्रसाद पाण्डेय, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, रामचरित उपाध्याय, ठाकुर गोपाल शरण सिंह आदि की गणना प्रभावमण्डल से अलग होकर पूर्व से ही अयोध्या सिंह उपाध्याय, ठाकुर गोपाल शरण सिंह आदि की गणना प्रभा मण्डल से अलग होकर पूर्व से ही अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ तथा जयशंकर प्रसाद जैसे प्रसिद्ध कवि पहले से ही खड़ी बोली के रचनाकारों का नेतृत्व कर रहे थे।
आचार्य द्विवेदी का ‘सरस्वती’ संपादन काल लगभग दो दशक तक चला। सम्पादन भार लेते ही द्विवेदी जी ने गद्य के परिस्कार उसे व्याकरण सम्मत बनाने तथा हिन्दी को प्रौढ़ तथा परिपक्व रूप देने हेतु कटिबद्ध हो उसका परिवर्तित व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। आचार्य द्विवेदी को हिन्दी के साथ ही उन्हें संस्कृत का ज्ञान पारिवारिक परम्परा से प्राप्त हुआ। इससे संस्कृत की कालजयी कृक्तियों की विस्तृत व्याख्या करने में समर्थ हुए। ऐसी रचनाओं में “नैषध चरित” कुमार सम्भव सार’, विक्रमांदेव चरित चर्चा’, ‘काली दास की निरंकुशता’ जैसे ग्रंथ लिखने में समर्थ हुए। ‘मेघदूत’ तथा ‘किरातार्जुनीय’ के पद्यानुवाद भी किए। रेलवे नौकरी के मध्य महाराष्ट्र तथा गुजरात के अनेक स्थानों पर रहने से उनको अधिकारिक मराठी तथा गुजराती भाषा का ज्ञान हो चुका था।’
आचार्य द्विवेदी अंग्रेजी ज्ञान से परिपक्व पहले से ही थे फलतः उन्होंने तत्कालीन योरोप के दार्शनिकों तथा चिन्तकों के चर्चित ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद भी किया। उन ग्रन्थों में जे.एस. मिल. की प्रसिद्ध रचना लिबर्टी,’ का अनुवाद ‘स्वाधीनता’, हरबर्ट स्पेन्सर की कृक्ति ‘एजुकेशन का अनुवाद’ शिक्षा, फ्रांसिंस बेकन के निवन्धों का अनुवाद’ बेकन विचार रत्नावली’ आदि श्रेणी के ग्रंथ हैं। आचार्य द्विवेदी बड़े स्पष्ट वादी खुले विचारक भी थे। वह आत्म वृतान्त के अपने लेखन में आये उस घटना का उल्लेख करना नहीं भूलते, जब उन्होंने किसी प्रकाशक द्वारा अच्छा पारिश्रमिक पाये जाने के लालच में लार्ड वायरन के यौन शिक्षा विषयक ग्रंथ ‘ब्राइडल नाइट’ का सार संक्षेप ‘सोहागरात’ नाम से लिखा। परन्तु आचार्य द्विवेदी की पत्नी के विरोध के कारण वे तैयार पाण्डुलिपि होते हुए भी प्रकाशित नहीं करा सके।
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र के पत्र ‘हंस’ के ‘आत्म कथा विशेषांक’ के लिए भेजे गये अपनी आत्म कथा के आचार्य द्विवेदी के लेख में अपने संघर्षमय जीवन तथा अपने ज्ञानोपार्जन विषयक बातें रोमांचकारी कितनी स्पष्ट लिखी हैं- “मैं एक ऐसी देहाती का एकमात्र आत्मज हूँ जिसका मासिक वेतन मात्र 10 रु. था। अपने गांव के देहाती मदरसे में थोड़ी सी उर्दू और घर पर थोड़ी सी संस्कृत पढ़कर 13 वर्ष की आयु में मैं 36 मील दूर रायबरेली के जिला स्कूल में अंग्रेजी पढ़ने लगा। आटा, दाल घर से पीठ पर लादकर ले जाता था। दाल ही में आटे के पेड़े या टिकिया पकाकर पेट पूजा किया करता था। रोटी बनाना तब मुझे आता ही नहीं था। दो आने फीस देता था। संस्कृत भाषा उस समय उस स्कूल में वैसी ही अछूत समझी जाती थी जैसे कि मद्रास के नम्बुदिरी ब्राह्मणों में वहां की शूद्र जाति समझी जाती है। विवश होकर अंग्रेजी के साथ फारसी पढ़ता था। एक वर्ष वहां किसी तरह काटा। फिर पुरवा, फतेहपुर और उन्नाव के स्कूलों में चार वर्ष काटे। कौटुम्बिक दुरावस्था के कारण मैं उससे आगे न पढ़ सका। मेरी स्कूली शिक्षा वहीं समाप्त हो गयी।”
इस वर्ष (2013 ई.) आचार्य द्विवेदी का 150 वां वर्ष होने पर युवा पत्रकार भी श्रीगौरव अवस्थी ने उनकी स्मृति में “आचार्य पथ” शीर्षक एक अविस्मरणीय पत्रिका प्रकाशित की है। इसमें प्रकाशित चयनित सामग्री संग्रहणीय है। संतोष की बात यह है कि युग निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रदत्त मार्ग दर्शन तथा लेखन क्षेत्र में उनका मूल्याकंन उनके जीवन काल में हो सका। “काशीनागरीय प्रचारिणी सभा’ ने 1931 ई. में उन्हें साहित्य सेवा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हेतु आचार्य शिवपूजन सहाय के सम्पादन में द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ उन्हें समर्पित किया। बाबू श्याम सुन्दर दास द्वारा लिखित उस अभिनंदन पत्र को साहित्यिक धरोहर में पुनः “आचार्यपथ ‘पत्रिका में प्रकाशित भी किया गया। इसी पत्रिका में एक लेख श्री गौरव अवस्थी की कलम से ‘गांधी परिवार और दौलत पुर’ शीर्षक में दौलत पुर और द्विवेदी जी की स्मृतियों को पुर्नजीवित करने वाला है। उस लेख में दिया है’ गांधी परिवार और हिन्दी के युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को जन्मस्थली दौलत पुर का रिश्ता 31 साल पुराना है।
विदेश में आचार्य श्रीकी ख्याति सुनकर प्रधान मंत्री रहते हुए स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी 7 अप्रैल 1973 को दौलत पुर गयी थीं। उनके आगमन को लेकर सराय बैरिहा बेड़ा से भोजपुर होते हुए दौलत पुर तक 19 किलोमीटर लम्बी सड़क रातों रात बनाई गयी थी।” आचार्य द्विवेदी मार्ग” का पत्थर आज भी लगा है। रायबरेली के वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पं. गयाप्रसाद शुक्ल जिन्हें जिला वासी तथा इन्दिरा जी भी आदरपूर्वक, गुरुजी’ कहकर संबोधित करती थीं। बताया करते थे कि इंदिरा जी को विदेश प्रवास के दौरान एक लाइब्रेरी में आचार्य जी द्वारा अनुवाद की गयी एक महत्व पूर्ण पुस्तक मिली। लेखक के अपने संसदीय क्षेत्र के होने से अवगत होते ही वह अभिभूत हो गयीं और अपने अगले रायबरेली दौर में ही उन्होंने दौलत पुर जाने का कार्यक्रम तय कर दिया। जब दौलत पुर तक पक्की सड़क नहीं थी। गुरु की बताया करते थे कि सराय वैरिया खेड़ा-भोजपुर-दौलतपुर (आचार्य द्विवेदी मार्ग) का उद्घाटन माननीय श्रीमती इंदिरागांधी प्रधान मंत्री द्वारा 7 अप्रैल 1973 को सम्पन्न हुआ। वह सड़क दिनरात पैट्रोमैक्स की रोशनी जलाकर मेहनत से बनाई गयी। इस बात पर इंदिरा जी के तब जिले ही नहीं देश भर के लोग कायल हुए थे।
गाँधी परिवार और दौलत पुर के बीच रिश्ते की इस कड़ी को और मजबूत किया स्वर्गीय इंदिरा जी की बहू सोनिया गांधी ने 30 नवम्बर 2010 को। इसी दिन सोनिया जी ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक अभियान समिति रायबरेली द्वारा जनसहयोग से आचार्य जी के जन्म स्थान के सामने स्मृति मन्दिर के बगल में आचार्य जी की आवच्छ प्रतिमा का अनावरण किया। आचार्य जी द्वारा पत्नी की स्मृति में निर्मित किये गये ‘स्मृति मंदिर’ में देवी लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियों के बीच कई दशक पहले पत्नी की मूर्ति स्थापित किये जाने के इतिहास से अवगत होते ही सोनिया गांधी अभिभूत होगई। हालांकि इसके पूर्व गांधी परिवार के ‘हनुमान’ कहे जाने वाले कैप्टन सतीश शर्मा ने सांसद निधि से पुस्तकालय वाचनालय भवन दौलतपुर में संचालित भी हो रहा है। प्रतिमा अनावरण के समय उनके मुख से पहला वाक्य निकला था “आप लोग भी ऐसा सम्मान पत्नियों का किया करिए”।
इसी अनावरण के अवसर पर हिन्दी सेवियों में प. कमला शंकर अवस्थी तथा खेमान खेड़ा (दौलतपुर के निकट) गांव के निवासी मुम्बई ‘नवनीत’ के पूर्व संपादक डा. गिरिजा शंकर द्विवेदी को सम्मानित करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “अंग्रेजी में जो स्थान ‘जानसन’ का है वही स्थान हिन्दी में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का है। यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे संसदीय क्षेत्र में महापुरुष का जन्म हुआ है।
