डॉ. दुर्गा चरण मिश्र
महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धान्तों को जनमानस तक पहुँचाने वाले यशः शेष डॉ. गिरिराज किशोर हमारे मध्य नहीं रहे, यह हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति है। यह सास्वत सत्य है कि जिसका जन्म होगा वह मृत्यु का वरण अवश्य करेगा। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा-
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु धुवं जन्म मृतस्य च।
तरमाद परिहायऽर्थेन त्वं शोचितुर्हसि।
जब जन्मे हुए की मृत्यु और मरे हुए का जन्म होना निश्चित है, तो इस विषय में शोकग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु सांसारिक प्राणी का यह ज्ञान तब तिरोहित हो जाता है जब उसका अन्तरंग व्यक्ति संसार से विदा होता है।
विगत 09 फरवरी 2020 को डॉ. गिरिराज किशोर की अप्रत्याशित मृत्यु ने कानपुर के हिन्दी प्रेमियों को झकझोर दिया। हिन्दी महारथी, कानपुर के गौरव, अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध, गांधीवादी विचारक अपने सूटरगंज आवास पर प्रातः दस बजे गंभीर हृदयाघात से ब्रह्मलीन हो गए। कलम के पुजारी, लोकप्रिय साहित्यकार के प अन्तिम दर्शनों हेतु स्नेही स्वजन, हिन्दी प्रेमी, समाजसेवी, न्यायविद जनों की भीड़ उनके आवास पर उमड़ प्यों पड़ी। दूसरे दिन प्रातःकाल 11.30 बजे गणेश शंकर विद्यार्थी चिकित्सा महाविद्यालय में उनकी देह वहाँ के पा प्रबन्धन को बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों के समक्ष सौंप दी गई। युग दधीचि बन उनकी अमर आत्मा तो उतने देवलोक पहुँच गई और जीवन पर्यन्त साहित्यिक शोध करने वाला पार्थिव शरीर चिकित्सा छात्रों को शोध सम्मा कार्यों में सहायक बनेगा। धन्य है वह मनीषी जो जीवनोपरान्त भी दूसरों के काम आते हैं।
08 जुलाई 1937 को मुजफ्फरपु नगर में श्री सूरज प्रकाश के पुत्र रूप में मोतीमहल मुहल्ले में जन्मे श्रीरक किशोर के पितामह लाला हरिशंकर लाल जमींदार थे। पाँच भाइयों और दो बहनों में सबसे बड़ी श्री गिरिराज किशोर ने एस.डी. कालेज मुजफ्फरनगर से बी.ए. और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.एस. डबल्यू पूर्ण कर धन असिस्टेण्ट एम्प्लायमॅट आफीसर बने। इसी बीच आगरा विज्ञान संस्थान से 1960 में मास्टर आफ सोसल म वर्क की डिग्री प्राप्त कर ली।
डॉ. गिरिराज किशोर का कर्मक्षेत्र बनने का गौरव बनने का सौभाग्य कानपुर को मिला। बचपन से ही उन्होंने अपनी लेखनी को अपनी जीविका का साधन बनाया। हिन्दी की समस्त विधाओं पर अपना आधिपत्य जमाया। 1960 से 1964 सेवायोजन अधिकारी उ.प्र., 1964 से 1966 इलाहाबाद में स्वतंत्र लेखन, 1966 से 1975 उप कुल सचिव कानपुर विश्वविद्यालय 1975 से 1983 तक कुल सचिव आई.आई.टी. कानपुर, 1983 से 1997 तक रचनात्मक लेखन केन्द्र की स्थापना एवं संचालन, 1997 से जीवन पर्यन्त स्वतंत्र लेखन एवं आकार’ पत्रिका का संपादन कर यश-सम्मान अर्जित किया। प्रातः चार बजे उठना और नियमित रूप से चार घण्टे लिखना उनका स्वभाव बन गया था।
डॉ. गिरिराज किशोर की कृतियों का विधानुसार वर्णन निम्नांकित है –
उपन्यास पहला गिरिमिटिया, ढाई घर, बा, लोग, चिड़िया घर, इन्द्र सुनें, दावेदार, तीसरी सत्ता, यथा प्रस्तावित, असलहा, अंतध्वंस, यातना घर के अतिरिक्त 8 लघु उपन्यास अष्टाचक्र नाम से प्रकाशित है।
कहानी संग्रह: नीम का फूल, चार मोही बेआब, रिस्ता, पेपखेट, शहर दर शहर, हम प्यार कर लें, – जगतारनी, वल्द रोजी, यह देह किसकी, मेरी राजनीतिक कहानियाँ, हमारे मालिक सब के मालिक।
– नाटक : नरमेघ, प्रजा ही रहने दो, केवल मेरा नाम लो, जुर्म आयद, काठ की तोप, मोहन का दुख।
निबन्ध: संवाद सेतु, लिखने का तर्क, सरोकार, कथ-अकथ, समपर्णी, एक जनसभा की त्रासदी, जन जन जन सत्ता।
पहला गिरमिटिया उनका बहुचर्चित उपन्यास है। महात्मा गांधी पर दक्षिण अफ्रीका प्रवास कर उन्होंने तथ्यों का आकलन किया। बाद में के.के. बिड़ला फाउण्डेशन ने उसे सम्मानित किया जिससे लेखक का वश-सम्मान बढ़ा। वर्ष 2007 में भारत सरकार ने प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ सम्मान से गौरवान्वित किया। चेहरे चेहरे कितने चेहरे पर भारतेन्दु सम्मान, उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा महात्मा गांधी सम्मान और साहित्य भूषण सम्मान, भारतीय परिषद द्वारा शतदल सम्मान, राष्ट्रीय मैथिली शरण गुप्त सम्मान, परिशिष्ट उपन्यास पर म.प्र. कला परिषद का वीर सिंह देवज सम्मान आदि अनेक सम्मानों से अलंकृत कर संस्थाओं ने स्वयं को गौरवान्वित किया है।
हनुमान जी के कई गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करते उनका उपन्यास ‘आंजनेय जयते’ मानस संगम कानपुर के संस्थापक पं. बदी नारायण तिवारी के विशेष आग्रह और प्रयत्नों का सुफल है। श्री तिवारी ने हनुमान जी से सम्बन्धित सैकड़ों पुस्तकें उन्हें उपलब्ध करा लिखने को प्रेरित किया था, जिनमें मेरी काव्यकृति जय आंजनेय’ भी सम्मिलित थी। कई वर्षों के अम से तैयार उनकी कृति बहुचर्चित है।
डॉ. गिरिराज किशोर की उपलब्धियाँ प्रचुर है। अपनी सेवा निवृत्ति पश्चात् 1998-1999 में संस्कृति मंत्रालय में समस्टिक फेलोशिप, 1999-2001 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास शिमला में फेलोशिप, वर्ष 2002 में छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर ने डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान किया। नई दिल्ली साहित्य अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य और हिन्दी सलाहकार समिति रेलवे बोर्ड के सदस्य रहे।
मानस संगम के वार्षिक समारोहों, तुलसी जयन्ती समारोहों और हनुमान जयन्तियों में मुझे उनके सान्निध्य सुख का अनुभव दो दशकों से अधिक समय तक मिला। समाजसेवी श्री रघुनाथ सिंह और श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवा) पर आधारित कृतियों के संपादक के रूप में कई बार उनके आवास पर जाने का अवसर मिला। साहित्य चर्चा करते वह सदैव प्रसन्न दिखे। श्री देवेन्द्र पाल गुप्त ‘सुहृद’ स्मृति ग्रंथ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते मेरे अनुरोध पर गैजेज क्लब में पधार कर कार्यक्रम को शिखर पर पहुँचा उपकृत किया। मेरे अमृत महोत्सव पर प्रकाशित अभिनन्दन ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा कर कहा- बहुत अच्छा ग्रन्थ है बधाई। मैं इनकी विद्वता, सौम्यता और स्पष्टवादिता का प्रशंसक रहा हूँ।
आज पद्मश्री डॉ. गिरिराज किशोर का पार्थिव शरीर हमारे मध्य नहीं रहा, परन्तु महात्मा गाँधी के प्रति उनकी निष्ठा हिन्दी के प्रति लगाव, विलक्षण लेखन प्रतिमा, सहिष्णुता, सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरुकता, संपर्क में आए व्यक्ति को जीवन पर्यन्त स्मरण रहेगी। कानपुर महानगर को उन पर गर्व है उनके जाने से नगर में शून्यता का अभाष हो रहा है। उनके निधन से हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है। वह अपने पीछे सहधर्मिणी मीरा जी, पुत्रियाँ जया और शिवा तथा पुत्र अनीष छोड़ गए है, जो उनकी यश कीर्ति प्रसारित करते रहेंगे। अपने कर्तव्य से वह अमर रहेंगे। मैं मानस संगम, एवं साहित्य मन्दाकिनी संस्था और स्वयं अपनी ओर से उनकी पावन स्मृति को नमन कर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
