शिवा अवस्थी
डॉ. बद्री नारायण तिवारी…. नाम सुनते ही उन्हें जानने वाले हर किसी की आंखों में उनकी शख्सियत उभरकर सामने आ जाती है। वो हिंदी साहित्य के मूर्धन्य सेवक हैं तो राम के आदर्शों को देश-विदेश में जन-जन तक पहुंचाने के लिए 53 वर्षों से मानस संगम के जरिये प्रयासरत हैं। रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास के अनन्य उपासक हैं तो साफ-सुथरी राजनीति और समाजसेवा के प्रतिमान भी। 87 साल की उम्र में भी हर जाति वर्ग के साहित्यकारों को मंच देकर उनकी प्रतिभा को सामने लाने की कोशिशें परवान चढ़ा रहे हैं।
विद्यावाचस्पति मानद उपाधि से सम्मानित बद्री नारायण तिवारी का जन्म 13 दिसम्बर, 1934 में प्रयाग नारायण शिवाला, गिलिस बाजार में हुआ। वह बताते हैं, डेढ़ साल की उम्र में ही उनके पिता शेष नारायण तिवारी यह दुनिया छोड़ गए, जो प्रख्यात समाजसेवी व पूर्व म्यूनिसिपल कमिश्नर थे। अपने जीवनकाल के इस पड़ाव तक सांस्कृतिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकीकरण, सामाजिक, साहित्यिक विषयों पर अब तक 75 पुस्तकें संपादित कर चुके हैं। मुस्लिम कलाकारों की इंद्रधनुषी रामकथा, रामकथा और मुस्लिम साहित्यकार, विश्वकवि तुलसी और मुस्लिम कलमकार, वोल्गा और गंगा के सेतु-वारन्निकोव, रूस के तुलसीदास जैसी पुस्तकें शामिल हैं। वर्ष 2011 से 2015 तक मानस संसाधन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, हिन्दी भाषा उत्थान हेतु गठित कमेटी के मनोनीत सदस्य रहे।
नानाराव पार्क में शहीद उपवन की कराई स्थापना
नई पीढ़ी की जानकारी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में देश के लिए बलिदान देने वालों, 1857 स्वातंत्रय समर के क्रांतिकारी और वीरांगनाओं की स्मृति में नानाराव में शहीद उपवन की स्थापना में डा. बद्री नारायण तिवारी ने अहम भूमिका निभाई। 18 सितम्बर, 1992 को वहाँ पर 51 बलिदानियों की प्रतिमाएं लगवाने की दिशा में काम शुरू कराया। साथ ही बलिदानियों को याद रखने के लिए वहाँ शिलालेख लगवाए।
मोतीझील में तुलसी उपवन दे रहा प्रेरणा
डॉ. बद्री नारायण तिवारी ने 25 सितम्बर, 1981 में तुलसी उपवन का निर्माण कराकर कानपुर नगर निगम को समर्पित किया। यह लोगों के लिए प्रेरक दर्शनीय स्थल है, जहाँ तुलसीदास जी की प्रतिमा के साथ शबरी व राम, केवट और राम मिलन, जटायु मिलन, वशिष्ठ-केवट मिलन के प्रेरक प्रसंग बताती प्रतिमाएं स्थापित है। यह युवा पीढ़ी को संदेश दे रही हैं। प्रतिवर्ष तुलसी जयंती पर यहाँ समारोह आयोजित होते हैं।
यह मिल चुके प्रमुख सम्मान
राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल अंशुमान सिंह के हाथों नेशनल इंटीगेशन आफ इंडिया इलाहाबाद द्वारा राष्ट्रीय एकता सम्मान।
मारीशस सरकार द्वारा पोटलुई में महर्षि अगस्त्य-2003 सम्मान।
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से हिंदी सेवा सम्मान।
हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की सर्वोच्च उपाधि साहित्य वाचस्पति मानद उपाधि।
गुजरात हिंदी विद्यापीठ, अहमदाबाद गुजरात की ओर से साहित्य श्री उपाधि।
मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ग्वालियर की ओर से सम्मान।
समय-समय पर देश के अलग-अलग राज्यों से सम्मानित किए गए।
साभार – दैनिक जागरण
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