डॉ• बद्री नारायण तिवारी
हिन्दी का सर्वप्रथम नाम ‘हिन्दवी’ रखने वाले साहित्य के आदिकालीन कवि अमीर खुसरो थे। अमीर खसरों का प्रारम्भिक नाम अब्दुल हसन था। उनका जन्म एक तुका परिवार में सन् 1253 ई. में उत्तर प्रदेश के एय के ‘पटियाली’ नामक कस्बे में हुआ था। अमीर खुसरो को बचपन से ही कविता से लगाव था जिसे उदानि स्वयं लिखा है- ‘मेरे पिता ने मुझे पढ़ने के लिये मकृतब भेजा और शिक्षक ने मुझे सुलेख लिखाने का प्रयास किया किन्तु मेरा मन कविता के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में नहीं लगता था।”
अमीर खुसरो बहुमुखी प्रतिभा के बहुभाषाविद् उच्चकोटि के संगीतज एवं इतिहासकार भी थे। अमीर खुसरो फारसी तथा हिन्दी दोनों भाषाओं के लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त इन्हें खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम कवि माना गया है। डॉ. रामकुमार वर्मा के कथनानुसार, ‘खड़ी बोली में प्रथम लिखने वाले अमीर खुसरो हुए, जिन्होंने अपनी पहेलियाँ, मुकरियों आदि में इस भाषा का प्रयोग किया। यद्यपि ब्रजभाषा को ही उन्होंने विशेष आश्रय दिया पर उन्होंने खड़ी बोली को भी उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा।’
यद्यपि जनमानस में कहा जाता है कि अमीर खुसरो ने लगभग 92 ग्रंथों की रचना की थी परन्तु इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं मिलता है। अमीर खुसरो चिश्ती सम्प्रदाय के प्रसिद्ध नौर निजामुद्दीन औलिया के भक्तों में थे। खुसरो के काव्य में सूफीनामा की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वे अपनी रचना ‘गुर्रतुलकमाल’ को भूमिका में लिखते हैं कि मैंने अपनी हिन्दी कविताएँ अपने मित्रों में बिखेर दी हैं परन्तु इन कविताओं में कुछ कविताएँ सूफी विचार से सराबोर हैं। खुसरो की दृष्टि में सूफी शब्द का तात्पर्य है कि जो व्यक्ति पवित्र जीवन व्यतीत करते हुए धर्माचरण में लीन रहते थे, सूफी कहलाये। हिन्दी के विद्वान कालीकट विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मलिक मोहम्मद को कृति ‘अमीर खुसरो, भावात्मक एकता के मसीहा’ में स्पष्ट लिखते हैं, ‘एक साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड इथिक्स’ में लिखा है कि अधिकांश व्यक्ति इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘सफा’ शब्द से मानते हैं। उनका कथन है कि जो लोग पवित्र थे, वे सूफी कहलाये।
अमीर खुसरो के काव्य में रेखांकित पंक्तियों में सूफीनामा रंग के दोहे में साधक को आत्मा और ईश्वरीय सत्ता के मिलन को भाव व्यंजना कितने सुन्दर शब्दों में व्यक्त हुयी है –
‘खुसरो रैन सुहाय की जागी पी के संग।
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग।’
तेरहवीं शताब्दी में सर्वप्रथम ‘हिन्दी’ का नामकरण ‘हिन्दवी’ नाम से अमीर खुसरो ने ही दिया। जो प्रचलन में अपभ्रंश होकर ‘हिन्दवी’ से ‘हिन्दी’ नाम से चर्चित हो गया। हिन्दी खड़ी बोली की रचनायें सर्वप्रथम सुफी कविता में लिखकर प्रचलित करने के साथ ही जबकि उस समय फारसी रचनाओं का ही वर्चस्व था। ऐसे समय तत्कालीन फारसी प्रेम की पद्धति के विपरीत भारतीय प्रेम परम्परा का दबदबा किय प्रकार का कायम तरते हुए खुसरो की प्रस्तुत पंक्तियों में व्यक्त किया है-
‘इश्क अब्बल हर दिले माशक पैदा मीशवद,
ता न सोज़द, शमा के परवाने शैदा मौशवद् ।’
अर्थात – पहले तिय के हीय में, उमगत प्रेम उमंग। आगे बाती बरति है, पीछे जरत पतंग।
अमीर खुसरो अपने गुरू औलिया हजरत निजामुद्दीन के निधन का दुःखद समाचार मिलने पर जब उनकी दरगाह पर अजमेर पहुँचे तो रहस्यवादी सूफी शैली में यह दोहा पढ़ा, जो अब बहुचर्चित है-
‘गोरी सोवे सेज पर मुख डारे केस।
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस।’
खुसरो हिन्दी खड़ी बोली के सूफी कवि थे और फारसी में उन्होंने सूफी मत की रचनाएँ लिखी है। वह उनका एक रूप रहा होगा परन्तु खुसरो का जो रूप हिन्दवी में प्रकट हुआ वह रहस्यवादी नहीं वरन् सामान्य जनजीवन के सरस कवि रूप का है। वस्तुतः मनुष्य का परलोक का रूप न देकर यहीं के प्रेम, मस्ती एवं चंचलता को आनंदित करता तथा कविता में प्रदर्शित करता है।
भारत में अमीर खुसरो का यश ‘हिन्दी’ के नामकरण ‘हिन्दवी’ से आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। खुसरो ने फारसी के वर्चस्व काल में हिन्दी की रचनाएँ लिखकर जन सामान्य में अपनी ख्याति स्थापित की। वर्तमान समय में भी खुसरो की हिन्दी रचनाएँ जनप्रिय हैं। अमीर खुसरो ने अपनी हिन्दी निष्ठा को किस आत्मीय भाव से लिखा है-
‘तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिन्दी गोयम जवाब।
शक्र मिरत्री न दारम कज़ अरब गोयन सुखन।’
यानी मैं हिन्दुस्तान का तुर्क हूँ और हिन्दवी में उत्तर देता हूँ। मेरे पास मिश्री की मिठास नहीं है कि मैं अरबी में मीठी-मीठी बातें करूँ।
अमीर खुसरो भारतीय जनमानस में हिन्दी साहित्य के नामकरण एवं उनके नाम से साहित्य में अनेक पहेलियाँ, दोहे, गीत, मुकरियाँ, कव्वाली आदि अति प्रचलित हैं। हिन्दी अन्वेषक गोपीचंद नारंग ने हिन्दी काव्य के संबंध में अपनी कृति ‘अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य’ में लिखा है ‘अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य अपनी लोकप्रियता के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरिक होता रहा है और इन सात शताब्दियों में वह हमारी लोक परम्परा या लोक साहित्य का अंग बन गया है। लाखों-करोड़ों की जुबानों पर बढ़ने से उसमें संशोधन-परिवर्तन अवश्य हुआ होगा। संभव है अमीर खुसरो से सम्बद्ध काव्य के कुछ अंश मौलिक हों किन्तु कई अंश निश्चय ही ऐसे भी हैं जिन्हें कालांतर में बढ़ाया जाता रहा है।’
बहुभाषाविद् अमीर खुसरो प्रचलित फारसी भाषा से हिन्दी भाषा को जिसका सर्वप्रथम नामकरण उन्हीं ने ‘हिन्दवी’ नाम से प्रचलन भी किया था, उसे किसी भी तरह से फारसी से कम नहीं मान्यता प्रदान किया। अमीर खुसरो अपनी फारसी रचना ‘गुर्रतुलकमाल’ की प्रस्तावना में लिखते हैं जो उनकी आंतरिक हिन्दवी (हिन्दी) निष्ठ को व्यक्त करती है-
‘चूं मन तुती एक हिन्दम अज रासत पुर्सी।
जमन हिन्दवी पुर्सता नग्ज गायम।’
यानी यदि सही पूछो तो मैं हिन्द का तोता हूँ। यदि तुम मुझसे मीठी बातें करना चाहते हो तो ‘हिन्दवी’ में बात करो।
अमीर खुसरो पहला कवि है जिसने समूचे राष्ट्र की भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, यह बड़ी स्वच्छन्दता से संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्रज, उर्दू, अरबी, फारसी तथा अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसीलिये खुसरो को हिन्दी की रचनाएँ शताब्दियों बाद भी जनप्रिय है। अन्त में अमीर खुसरो को हिन्दी प्रेम की रेखांकित पंक्तियाँ ही उनकी निष्ठा को प्रकट करती हैं-
‘तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिन्दी गोयम जवाब।
शक्र मिस्त्री न दारम कज अरब गोयम सुखन।’
यानी मैं हिन्दुस्तान का तुर्क हूँ और हिन्दवी में उत्तर देता हूँ। मेरे पास मिश्री की मिठास नहीं है कि मैं अरबी में बात करूं। ये विचार सात शताब्दियों पूर्व बहुभाषाविद् आदि खड़ी बोली के सर्वप्रथम कवि अमीर खुसरो के हिन्दी (हिन्दवी) के प्रति कितने स्पष्ट विचार हैं|
