Monday, February 23, 2026

अरब में वेदों का नाद जब गूँजा था

– डॉ• बद्री नारायण तिवारी

विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण के फलस्वरूप हिन्दू जाति ने आत्मरक्षार्थ अपने को अनेकों नियन्त्रणों और बन्धनों में जकड़ लिया। पर्दा प्रथा, बाल विवाह एवं समुद्र यात्रा का वर्जित घोषित किया जाना आदि उन्हीं दिनों की देन प्रतीत होते हैं। किन्तु इतिहास साक्षी है कि आर्य पूर्वजों ने सागर की उत्ताल तरंगों को लांघकर, दूर्लध्य पर्वतमालाओं को लांघकर, वैदिक धर्म की पावन पताका दिग्-दिगन्त में फहराई थी आज के रूस के अनेक प्रदेशों में हुए उत्खनन और पुरातत्व अन्वेषण कार्य के फलस्वरूप यज्ञशालाओं प्रतिमाओं और देवालयों के ध्वंसावशेष मिले हैं तो मैक्सिको (अमरीका) से सहस्त्रों पर्वतमालाओं पर खड़े मन्दिर आर्यों के दिग्दिगंत में विस्तार की कहानी सुनाते प्रतीत होते हैं। आज का कन्धार ही कल का गान्धार देश है तो जो अरब इस्लाम की उद्भव स्थली है वहाँ भी प्राचीनकाल में आर्य सभ्यता, ज्ञान, विज्ञान और वैदिक धर्म का नाद गूंजता रहा है। अनेकों आर्य सन्यासी और विद्वान अरब के मरुस्थलों में भी अनेकों कष्ट कंटकों को स्वेच्छ्या सहनकर ज्ञान की गंगा से अज्ञान को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करने में संलग्न थे।

आर्य सम्राटों की प्रेरणा पर जिन विद्वानों और साधु-संतों ने विश्व भ्रमण किया अथवा जो स्वेच्छ्या पर्यटक बने, वेदों के पावन संदेश को जन-जन में गुंजाते घूमे, जो वृहत्तर भारत के सृजनहार सिद्ध हुए, इन विद्वानों में से अनेकों ने अरब देश को भी अपना कार्यक्षेत्र बनाया था।

सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में वैदिक धर्म प्रचारार्थ अनेकों विद्वानों को अरब स्थान भी भेजा गया था। उन्होंने ही वहां की मूढ़ता और मूर्खता के पंजों में जकड़ी जनता को विद्या की पावन ज्योति से ज्योतित कर अन्धकार में प्रकाश की किरण दिखाई थी। उन महान् आर्य मनीषियों और साधु संतों तथा विद्वज्जनों के कार्य की महत्ता का वर्णन मुहम्मद साहब (इस्लाम धर्म के संस्थापक) से भी पहले के एक अरब कवि श्री जहेम बिनतोई ने अपनी एक कविता में करते हुए उनके प्रति श्रद्धा ज्ञापन किया है। उसकी वह कविता प्रस्तुत है।

इत्रश्श्फाई सततुल विकरमतुद
फहलमीन करीमन यर्तकीहा वयोवस्ससू।
बिहिल्लायर्मामिन एला मोतकब्बेरनर,
बिठिल्लाहा यूही कैद मिन होना यफखरू।

फख्जल आसारी नहनोओ सर्गरमेजेहलीन,
यरीदुन वियाबिन कजनबिनयखतरन।
यह सब दुन्या कतातेफ नार्तकी विजहलीन,
अदतदरी विलला भसीरतुन फरेफ तसबहू।

कऊन्नी एजा माजकरलहदा यलदहा,
अशमीमान्, बुरकन कट तौलु हो वतस्तरु।
विहित्लाहा यकजी वैननावले कुल्ले अमरेना,
फहेया जाऊन विल अमरे विवरमतुन।।

अर्थात् – वे ही लोग धन्य है जो महाराजा विक्रमादित्य के राज्य काल में जन्में है, जो बता दार्ग धर्मात्मा तथा प्रजावत्सल था। किंतु ऐसे समय में हमारा अरब देश, ईश्वर को भूलकर भोगविलास व मस्त था। छल कपट को तो लोगों ने सर्वोत्तम गुण मान लिया था। हमारे समग्र देश (अरब) में अविद्य का अधकार व्याप्त था। जिस माति बकरी का बच्चा भेड़िये के पंजे में फंसकर छटपटाता है, परन्तु छूट नहीं पाता उसी प्रकार हमारी जाति भी मूर्खता के पंजों में फाँसी हुई थी। इस अविद्या के कारण हम सांसारिक व्यवहार को भी मूल चुके थे और सम्पूर्ण देश में अमावस्या की काली रात्रि के तुल्य सघन अन्धकार व्याप्त था। परन्तु अब विद्या का जो प्रात कालीन सुखदायी प्रकाश परिलक्षित हो रहा है वह हुआ कैसे। यह उसी धर्मात्मा नरेश विक्रम की कृपादृष्टि का परिणाम है, जिसने हम विदेशियों को भी अपनी दया-दृष्टि से वंचित नहीं रखा और पावन धर्म का संदेश देने हेतु अपनी जाति के उन विद्वानों को यहाँ भेजा जे हमारे देश में सूर्य के समान आलोकित थे। जिन महापुरुषों की कृपा से हमने विस्मृत हुए भगवान और उसके पावन ज्ञान को जाना तथा हम सत्यपथ के अनुगामी बने, वे राजा विक्रम की आज्ञा से ही हमारे देश में विद्या और धर्म के प्रचारार्थ आए थे।

उत्त अरबी कवि की उपरोक्त कविता सेऊखल उकोल’ नामक संग्रह में समाविष्ट है। यह इस्तंबूत के राजकीय पुस्तकालय में अभी भी उपलब्ध बताया जाता है। उपरोक्त कृतज्ञता ज्ञापन इस सत्य की साझी प्रस्तुत करता है कि हजरत मुहम्मद का जनम से मी अनेकों वर्ष पूर्व अरब स्थान में वेदों के पावन मन्त्र गूंजते थे।

इतना ही नहीं गणित, ज्योतिष, कलाकौशल, खेल-कूद, कथा कहानियों सम्बन्धी सैकड़ों संस्कृत ग्रंथों का भी अरबी भाषा में अनुवाद किया गया था। अरबों ने ज्ञान की प्राप्ति वैदिक विद्वानों से ही की थी अनेक अन्वेषकों और इतिहासकारों ने भी इस सत्य की पुष्टि की है। पंचतंत्र की अनेक कहानियों को अरय में प्रचलित कथाओं में मामूली संशोधन सहित ग्रहण किया गया था तो अनेकी कहानियाँ ज्यों की त्यों ही वहाँ प्रचलित हुई थीं।

भारत और अरब देश का व्यापारिक सम्बन्ध मी सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही स्थापित हो चुका था और आर्य विप्रजनों ने मी व्यापारियों को धर्म की वास्तविक महत्ता से अवगत कराया था| अरब विद्वानों ने आर्य विद्वानों से जो ज्ञान अर्जित किया था, उसी को उन्होंने ज्योतिष शास्त्र, गमित और कला के रूप में विश्व के अन्य अंचलों में फैलाया था।

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