Monday, February 23, 2026

बिठूर का ध्वस्त किला

वर्तमान वैज्ञानिक युग में जब ध्वनि से भी तीव्र गति वाले युद्धक बम वर्षक विमानों, दूरभेदी शक्तिशाली तोपों एवं मीलों दूर से चिन्हांकित निशानों पर मार करने वाली मिसाइलों एवं रॉकेट का आविष्कार हो चुका है। ऐसे समय में पहरी रूप में कवच या ढाल का काम करने वाले किलों की चर्चा करना भी महत्वहीन सा प्रतीत होता है, किन्तु अतीत के इन पहरुए किलों का महत्व आज भी कम प्रासंगिक नहीं है।

अतीत की ओर झाँकने पर देश की रक्षा में किलों का अपना विशेष महत्व होता था। वही शासक बलशाली माना जाता था जिसके पास अधिकाधिक किले हो अथवा शत्रुओं के किलों पर अधिकार करके अपना ध्वज फहरा कर विजय की दुन्दुभी बजाता था। किले के परकोटों के अन्दर एक लघु नगर का स्वरूप निर्मित होता था। उसमें युद्ध सामग्री के अतिरिक्त हजारों व्यक्तियों की खाद्य आपूर्ति का विशाल भण्डार होने से कई महीनों तक शत्रुओं से युद्ध करने में भी शासक सक्षम रहते थे। किलों के अन्दर जीवन रक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पेय जल की व्यवस्था करना था जो बड़ी-बड़ी बावड़ी या कुएं बनवाकर की जाती थी।

भारत के प्रत्येक क्षेत्र स्थित दुर्गों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक घटनायें उनकी प्राचीरों पर स्थित बुर्जा से आज भी गूँजती रहती है। अतीत के ये किले चाहे सिंहगढ़ का किला हो या चित्तौड़ का, आगरे का या दिल्ली का लाल किला हो, गोलकुण्डा, रणथम्भौर, जयपुर-आमेर का किला, बुन्देलखण्ड स्थित कालिंजर का किला झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का किला अथवा ग्वालियर का किला। अपने आप में ये विशिष्टता रखते हैं तथा सम्बन्धित शासकों की वीरता, पराक्रम व शौर्य की झलक देते हैं। ये सभी किले तत्काली समय के राज्यों के उत्थान पतन के साथ ही प्राचीन गौरव गाथाओं को आज भी संजोये हुये हैं।

अतीत के पहरुए इन किलों में शासक गणों की सुरक्षा की दृष्टि से आवासीय व्यवस्था भी रहती थी। प्रजा की सुनवाई हेतु आम दरबार तथा मंत्रियों से विचार विमर्श कर निर्णय हेतु खास दरबार के कक्षों का पृथक मंत्रणा कक्ष भी होता था। इन्हीं किलों में विशिष्ट राजकीय बन्दियों हेतु कारागार तथा फाँसी घर भी होते थे। युद्ध के संक्रमणकाल में किले से बाहर निकलने के गुप्त मार्गों तथा सुरंगों की सुव्यवस्थित ढंग से व्यूह रचना का निर्माण भी होता था।

किले के अन्दर ही आमोद-प्रमोद के विशाल कक्षों के अलावा पूजन अर्चन हेतु सभी धर्मों के देवालय भी निर्मित होते थे।

किलों के इतिहास की ऊबड़ खाबड़ पथरीली पगडंडियों से गुजरते समय क्षेत्रफल की ही दृष्टि से लघु होते हुये भी ध्वस्त बिठूर किले के खण्डहर विदेशी क्रूर अंग्रेज शासकों के भयंकर दमन की दर्द भरी कहानी सुनाकर वर्तमान पीढ़ी का राष्ट्रप्रेम हेतु आ‌ह्वान करते हैं।

सुविख्यात इतिहासकार श्री प्रतुल सी. गुप्ता कृत “द लास्ट पेशवा एण्ड द इंग्लिश कमिशनर्स” में लिखा है कि पूना (महाराष्ट्र) से बाजीराव पेशवा को सन् 1818 ई. में निष्कासित करने का आदेश दिया गया था। अंग्रेजी हुकूमत ने महाराष्ट्र से दूर अंचल उत्तर भारत के कानपुर से 8 मील दूर गंगा तट पर स्थित बिठूर नगर में पेशवा को पूना से निर्वासित कर प्रवास का निर्देश दिया।

इसके अनुसार भी पेशवा फरवरी सन् 1819 से जीवन पर्यन्त सन् 1851 यानी 32 वर्ष बिठूर में ही निवास किया अंग्रेजों की संदेह दृष्टि के रहते हुये पेशवा ने महल का नाम देकर आन्तरिक रूप से किले का निर्माण अपने आवास हेतु करया। यही पेशवा का महल बिठूर के किले के नाम से प्रख्यात रहा।

1857 ई. के एक दशक पूर्व सन् 1847 में इतिहासकारों ने कानपुर जनपद के बिठूर नगर की आबादी 1500 लिखी है। बाजीराव पेशवा की जागीर में बच्चों सहित 7313 व्यक्ति थे, बिठूर नगर के बाहर 2235 पेशवा सहयोगी समर्थकों के अतिरिक्त 100 घोड़े तथा 750 सिपाहियों की छोटी से सेना की वाहिनी निवास करती थी।

बिदूर में बाजीराव पेशवा की समकालीन गतिविधियों पर दृष्टि रखने हेतु उनके जीवन काल में कूटनीतिक ढंग से चार अंग्रेज पर्यवेक्षक आयुक्त रूप में नियुक्त किये गये जिनके नाम जान लो. ई.जे. जानसन, विलियम कुक और जेम्स मेन्सन है। ये आयुक्त समय-समय पर पेशवा के समस्त कार्य कलापों के लेखा-जोखा की टिप्पणियां (रिपोर्ट) उच्च अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारियों को प्रेषित किया करते थे। इन्हीं गौरांग आयुक्तों की संस्तुतियों के आधार पर बाजीराव पेशवा की अन्तिम उत्कृष्ठ अभिलाषा अपनी पितृ भूमि पूना को देखने से वंचित करके उनकी कामना को अपूर्ण ही रखा। पेशवा ने उसी दुख में अपने प्राण त्याग दिये।

बिठूर का यह किला जिसमें पेशवा रहते थे। श्री बाजीराव पेशवा के निधन (सन् 1851) के बाद श्री – नाना राव पेशवा के कार्यकाल में यह महल वास्तविक रूप में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम (जिसे अंग्रेजों -ने गदर नाम से प्रचारित किया था) का केन्द्र स्थल बन जाने से अंग्रेजों की आँख की किरकिरी बन – खटकने लगा। छोटे से क्षेत्रफल वाला यह किला 1857 के जीते जागते इतिहास की धरोहर बन गया। इसी पावन स्थल में सुविख्यात वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का बचपन ‘छबीली’ के रूप में बीता था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने सर्व प्रथम भारतीय सैनिकों तत्पश्चात अंग्रेज सैनिकों ने ब्रिटिश शासन को यथावत बनाये रखने हेतु निर्दयता पूर्वक उस (पेशवा के महल) किले का नामोनिशान तक मिटा दिया यह भी इतिहास का एक महत्वपूर्ण भाग है। अब अवशेष रूप में एक चबूतरा बचा है जिस पर नानाराव पेशवा, अजीमुल्ला खाँ, तात्या टोपे आदि क्रान्तिकारी देश की आजादी की रणनीति को कार्यान्वित करने की  योजना बनाते थे। उस चबूतरे पर लगे शिलालेख में अंकित पंक्तियों को पढ़ने से इतिहास की पुरानी स्मृतियाँ जागृत हो उठती है।

यायावर श्री विष्णु भट्ट गोडशे ने पदयात्री बनकर 1857 की गदर का आँखों देखा हाल अपनी ऐतिहासिक यात्रा वृतान्तिक मराठी कृति “माझा प्रवास” में लिखा है। इस कृति का हिन्दी रूपान्तर प्रसिद्ध कथाकार श्री अमृतलाल नागर ने आँखों देखा गदर’ नामक कृति के रूप में किया है। इस कृति के ग्वालियर बिठूर वृत्तान्त के अन्तर्गत 1857 के बिठूर से सम्बन्धित रेखांकित प्रस्तुत पंक्तियों से बिठूर के धार्मिक पौराणिक स्थल से परिवर्तित होकर ऐतिहासिक महत्व के स्थल की प्रमाणिकता मिलती है।

कानपुर में दो दिन सब बन्दोवश्त करके गोरे लोग और कुछ काली पलटन बिठूर यानी बह्मावर्त की ओर बदी। श्रीमंत पेशवा के गंगापार होने के तीसरे दिन सबेरे चार घड़ी दिन बीते गोरी फौज ने बिठूर पर हमला बोल दिया।

इस तरह चार पहर बीतते-बीतते हजारों लोग मारे गये। नगर शमशान बन गया। बिठूर नाना साहब की निवास भूमि थी, इसलिये गोरे लोगों की उस पर विशेष कृपा दृष्टि होना स्वाभाविक ही था। हजारों लोगों का रक्तपात कर व धन सम्पत्ति लूटकर भी उनके प्रतिशोध की ज्वाला शान्त न हुई। अन्त में उन्होंने ऐश्वर्य से भरे पूरे राज महल को लूटकर आग लगा दी, शहर का परकोटा और फाटक तोड़कर गिरा दिया। पदयात्री श्री विष्णु भट्ट गोडशे द्वारा लिखित यह यात्रा वृतान्त भारतीय वाड्मय साहित्य के अलावा ऐतिहासिक धरोहर हो गया- श्री गोडशे का निधन 75 वर्ष की आयु (सन् 1903) में हो गया।

प्रत्येक किले की अपनी अलग-अलग शैली के निर्माणों पर इतिहास वेत्ता एवं पुरातत्ववेत्ता शोधकार्य करके नई-नई जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं, किन्तु बिदूर का यह राजमहल रूपी किला धूल-धूसारित होकर देश की आजादी का प्रकाश विकीर्णित होकर निरन्तर राष्ट्र की सुरक्षा, एकता व अखण्डता हेतु जागरुक होने का संदेश दे रहा है।

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