Monday, February 23, 2026

जन भाषा और सत्ता की भाषा हिन्दी : वर्तमान में क्या स्थिति ?

डॉ. बद्री नारायण तिवारी

विगत वर्ष नई शासन व्यवस्था में हिंदी को लेकर जिस विराट परिवर्तन की तीव आँधी में हिंदी क परचम लहराया वह आश्चर्य से परिपूर्ण है। नई संसद में 5 जून, 2014 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द मोदी के अतिरिक्त श्री लाल कृष्ण अडवाणी ने हिंदी में शपथ ली श्रीमती सोनिया गाँधी ने भी हिंदी में ही शप ली। 539 लोक सभा सदस्यों ने भी कई सांसदों ने भी हिंदी में ही शपथ ली। सर्वप्रथम निर्वाचित होकर आए 315 सांसदों ने अपनी मातृभाषा में शपथ ली अर्थात् अधिकांश ने अंग्रेजी को ठुकरा दिया। यह राष्ट्रमाश के लिए सम्मान की बात हैं। श्रीमती सुषमा स्वराज (विदेश मंत्री), सुश्री उमा भारती, दिल्ली के सांसद है प्रवेश वर्मा, मीनाक्षी लेखी और महेश गिरि ने संस्कृत में ही शपथ ली। बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के सदस्ख सुदीप बंदोपाध्याय ने बंगला में न लेकर हिंदी में ही शपथ ली। केरल में कांग्रेस के सांसद श्री सुरेश भी हिंदी में ही शपथ ली।

सर्वप्रथम लोक तंत्र के भारत माता के मंदिर ‘लोक सभा’ में राष्ट्र भाषा हिन्दी का इतना गौरवपूर्ण मान-सम्मान तथा पर्व के रूप में जयघोष भी हुआ। इसकी पृष्ठभूमि में श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रभाषा को निर्वाचन के समय जिस ऊँचाई पर सारे भारत में पहुँचाया वह एक उदाहरण बन गया। बड़ी भाषा प्रचार की जो संस्थायें अनेक वर्षों में हिंदी का सर्वजनीय प्रचार नहीं कर पाई वह कार्य इतने कम समय में मोदी जी ने कर दिखाया। जिन क्षेत्रों में हिंदी कभी नहीं पहुँची वहां भी हिंदी पहुंचाने का श्रेय मोदी जी ने राष्ट्रमाया को स्थापित कर एक इतिहास बनाया।

पद ग्रहण के बाद प्रधानमंत्री मोदी जी ने चीन की तरह विदेशी राजनेताओं और राजनीतियों के साथ परस्या वार्ता में भी अंग्रेजी का सहारा न लेते हुए उन्होंने “संपर्क भाषा” के रूप में हिंदी का ही प्रयोग किया। प्रधानमंत्री विदेशी राजनेताओं या प्रतिनिधियों से भी हिंदी में ही बोल कर उसकी अस्मिता की रक्षा करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप उनके राजनैतिक धुर विरोधी समाजवादी नेता सांसद श्री मुलायम सिंह यादव ने उनकी हिंदी भाष प्रयोग नीति की खुलकर प्रशंसा की है। विदेश यात्रा में अमेरिका, जापान, फ्रांस, अफगानिस्तान, इंग्लैण्ड आदि छोटे-बड़े सभी देशों में हिंदी में बोलकर एक गुजराती भाषी ने देश की भाषा नीति का यथार्थ में उसके प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण कार्य किया। सांसद के सेन्ट्रल हाल में जब प्रधानमंत्री के नाम का प्रस्ताव श्री लालकृष्ण अडवाणी ने किया और नरेन्द्र मोदी को चुना गया। उसी समय तब ‘कृपा’ शब्द की जितनी तरह की व्याख्याएं प्रधानमंत्री मोदी जी ने उस घटना को हिन्दी के साहित्यकारों द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा करने पर एक उत्साहवर्द्धक स्वागत योग्य वातावरण बना। राजनीति के परस्पर विरोधी राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रेमी में पहली बार जन तंत्र के पावन मन्दिर ‘लोक सभा’ में हिंदी और राष्ट्रभाषा का इतना मान सम्मान जय घोष के रूप में होने पर मीडिया के अंग्रेजी पत्रकार भी हिंदी बोलने को मजबूर हुए है।

इसी प्रकार पूर्व में अनेक विदेशी अंग्रेजी चैनल भी अपने को हिन्दी में परिवर्तित प्रसारण से भारतीय हिन्दी चैनल के समानान्तर बन गये। प्रधानमंत्री मोदी जी ने जिस प्रकार अपनी दिनचर्या में विदेशी राजनेताओ सहारा नहीं लिया। इससे संपर्क भाषा’ के रूप में मोदी जी के प्रयोग से अनेक केन्द्रीय मंत्री विदेश ॐ मंत्री सुषमा स्वराज भी देश-विदेश में हिंदी बोलने से अन्य मंत्री भी उसी पदचिन्हों पर चलने लगे। चर्चा में भी हिंदी मुहावरे प्रयोग होने लगे देश की उन्नति हेतु ‘अतुल्य भारत’, ‘स्वच्छ भारत’ ‘बेटी बचाओ प्रदूषण दूर करो’, ‘बेटा-बेटी एक समान’, ‘भ्रूण हत्या समाज का दुश्मन, छोटा परिवार सुखी परिवार’, नशा समाज का दुश्मन आदि लघु वाक्यों का विज्ञापन सिनेमा नुक्कड़ नाटक आदि में हिंदी का वर्चस्व बड़ा। हिंदी विरोधी आरोप लगाते हैं कि इनमें बोलियाँ अधिक हैं किन्तु वह नहीं जानते कि यही हिंदी बोलियां इसकी प्राणवायु है।

विदेश में किसी कार्यालय में अंग्रेजी, रूसी, चीनी, फ्रेंच, जापानी अधिकारी नहीं होता है जो भारत की निजे भांति 14 सितम्बर को ‘राजभाषा सप्ताह’ या ‘पखवाड़ा की तरह आयोजन नहीं करता है। वैसे सरकारी मंत्रालयों में शीर्षस्थ राजनेताओं के हिंदी प्रयोग से वह तेजी से प्रयोग होने लगी है। शासकीय मंत्रालयों में भी हिंदी प्रवेश कर गई है। उच्च अधिकारी भी हिंदी सीख रहे है, लिख रहे है और पढ़ भी रहे है। जिस रेल राष्ट्रीय राजकीय काम काज और व्यवहार में निरंतर पिछड़‌ती रही। इसके विपरीत विभिन्न कालों में भारत आये विदेशी यात्रियों, लेखकों के तत्कालीन कार्य कलापों के वर्णन से प्रमाणित है – उनके अनुभवपूर्ण यो लेखन साक्ष्य, भारतवासियों की उच्च स्तरीय साख की पुष्टि इसका प्रमाण है। ईसा पूर्व सातवीं शती में भारत आये चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ को ‘भारतवासी’ सेवा भावी, कृतज्ञ, शरणागत वत्सल, विश्वसनीय प्रतीत हुए ये चीनी यायावर ने अपनी डायरी में लिखा। इसी प्रकार यूनानी राजदूत ‘मेगस्थनीज’ ने यहाँ देख कर अनुभव किया ‘भारतीयों की ईमानदारी अतुल्य है, ये घरों में ताले-कुण्डी नहीं लगाते …. भारतीयों को अपनी सभ्यता की उच्चता पर गर्व है।’ यूनानी इतिहासकार ‘स्ट्रेबो’ भी भारतीयों की कोई बात निश्चय हो जाने पर उसकी प्रमाणिकता के लिए यहां के निवासियों को किसी प्रकार की लिखा पढ़ी की कोई आवश्यकता कि नहीं थी। ‘मार्कोपोलो’ की भी यही मान्यता थी ‘भारतीय इतने ईमानदार और सच्चे होते है कि किसी बात है के लिए कभी असत्य भाषण नहीं करते’ तत्पश्चात् नवीं शताब्दी के याकूबी और बाद में ‘अबुलफजल उनों ने भी भारतीयों के शुद्ध आचार-व्यवहार की बड़ी प्रशंसा की है। क्या इसी उत्थान-पतन में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त अपनी लेखनी में ये चर्चित पंक्तियां लिखने को मजबूर हुए थे हम क्या थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी…..

हूणों मुगलों ने भारत को शताब्दियों का इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत की भौतिक सम्पदा लूटने, समुन्नत संस्कृति-सभ्यता को ध्वस्त करने अथवा मनीषा को कुण्ठित करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सके। जबकि भीषण अमानुषिक अत्याचार तथा दमन के अनेक वीभत्स तरीको को अपनाया गया। -हवं उनके बाद अंग्रेजी शासन काल भी शताब्दियों अवर्णनीय अत्याचारों के पराधीनता के शासनकाल में बहुमुखी प्रहार भारतीय संस्कृति-भाषा को समाप्त करने का प्रयास किया। इसके बाद मी पाश्चात्य विद्वान ‘मैक्समूलर’ के मतानुसार ‘न केवल सत्य अपितु भारतवासियों की उदारता, बुद्धिमत्ता सहिष्णुता, सुशीलता मुक्तकंठता नम्रता विश्वनीयता यानी ईमानदारी, सुजनता, सुराविरक्ति श्रद्धा श्रमशीलता आदि इस समय भी उल्लेखनी है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर ‘रोमारोला’ बनार्ड शा. कवि सैमुअल जानसन आदि अनेक पाश्चात्य लेखकों ने भी भारतीयों के चरित्र, गरिमामयी व्यक्तित्व की बड़ी सराहना की है।

इस संदर्भ में भारतीयों की सांस्कृतिक भाषा-साहित्य को क्षत विक्षत यानी नष्ट करने के प्रमु सूत्रधार, ‘लार्ड मैकाले की चर्चा न हो सम्पूर्ण बात ही अपूर्ण रहेगी। भारत को ‘इण्डिया’ बनाने का सपना – लार्ड मैकाले की कल्पना थी। इतना बड़ा सपना संजोये लार्ड मैकाले’ जो भारत की संस्कृति – सम्यता एवं भाषा को अपने पाश्चात्य और यहाँ के भारतवासियों के विषय में सन् 1835 में लार्ड मैकाले के ब्रिटिश संसद लंदन में व्यक्त विचार उसकी दूषित मानसिकता की सत्यता का प्रतीक है।

यद्यपि उसने तत्कालीन भारत और भारतवासियों के नैतिक, चारित्रिक, आदर्शों का पूर्ण रूप से प्रशंसा भी करता है इसे ‘अंग्रेजी राज की साजिश का घोषणा पत्र’ और उनकी विकृत मंशा और मानसिकता का स्पष्ट परिचायक है। मैंने एक ओर से दूसरी ओर तक सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया है पर मैंने एक भी व्यक्ति नहीं देखा जो निखारी और चोर हो। मैंने इस देश में ऐसी सम्पदा, ऐसे उच्च नैतिक मूल्य, ऐसी प्रतिमा के लोग देखे हैं कि मैं नहीं सोचता कि हम कभी इस देश को जीत पायेंगे, जब तक कि इस देश की उस रीढ़ की हड्‌डी को ही न तोड़ दें जो कि इसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत है। इसलिए मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हम इस देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति व संस्कृति को बदल दें, क्योंकि यदि भारतीय यह सोचने लगे कि अंग्रेजी एवं जो कुछ विदेशी है, अच्छा है, हमारे अपने से बहुत बड़ा है तो वे अपने आत्मगौरव को, अपनी भारतीय संस्कृति को त्याग देंगे और वे वही हो जायेंगे, जो हम बनाना चाहते हैं अर्थात् सच्चे अर्थों में एक पराभूत व शासित देश।”

वस्तुतः मैकाले की इसी भावना ने साकार करते हुए हिंदी को समर्पित डॉ. सत्येन्द्र चतुर्वेदी के शब्दो में ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के मध्य खाई को इतनी गहरी बना दिया कि हम भारतीय तामसी भोगवादी जीवन शैली में येन-केन-प्रकारेण ‘अर्थ पिशाच’ के सम्मोहन में पूर्णरूपेण समाहित हो गये। समाज में निकृष्ट नृशंस घृणित कृत्यों को अंजाम देने में कोई संकोच, अपराध बोध या किसी तरह की ग्लानि का अहसास न होने लगा। विदेश में बैरिस्टर गांधी ने 22 वर्ष बिताने के बाद जो अनुभव किया उसी आधार पर अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने पर आजीवन जोर देते रहे। इसी संदर्भ में स्वाधीनता के पूर्व ‘हरिजन सेवक’ के 25.06.46 के अंक में प्रस्तुत पंक्तियाँ लिखी थीं ‘मेरी मातृभाषा में कितनी भी कमियां क्यों न हों, मैं उससे उसी तरह लिपटा रहूँगा, जिस तरह अपनी माँ की छाती से। वह मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। मैं अंग्रेजी को भी उसकी जगह प्यार करता हूँ लेकिन अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है, जिसकी वह हकदार नहीं, तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा।”

इसी प्रकार जब 15 अगस्त, 1947 की स्वाधीनता मिलने के बाद भी अंग्रेजी का वर्चस्व देश में जड़ जमाने लगा तो महात्मा गाँधी ने विवश होकर ‘हरिजन सेवक’ के 21.9.1947 के अंक में स्पष्ट लिखा जो  उनकी देशहित में भाषा नीति का परिचायक है “जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीनने वाले जी की सियासी हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति हो दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को भी हमें यहां से निकाल बाहर करना चाहिए”। गांधी जी के विचार अंग्रेजी के विरोध और हिंदी के पक्ष में कितने उग्र हो चुके थे। इसे सुप्रसिद्ध पत्रकार स्व. दुर्गादास की प्रकाशित इते कर्जन से नेहरू’ में देखने से मी सिद्ध होती है।

इस घटनाक्रम में भारत की स्वाधीनता को गाँधी जी की अहिंसावादी नीतियों के धुर विरोधी लंदन में सर्वोच्च प्रशासनिक शिक्षा आई.सी.एस. पास करने के बाद भी उसको तिलांजलि देकर आजादी प्राप्त हेतु शाक्ति यानी हिंसा का मार्ग अपनाया। उनका नाम भी बापू की तरह देश का बच्चा-बच्चा नेता जी सुभाष इन्द्र बोस के नाम से परिचित है। नेता जी ने विदेश में जो पहला रेडिया प्रसारण हिंदी में भारतवासियों को दिया वह राष्ट्रभाषा हिंदी में नेता जी ने सर्वप्रथम महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” के नाम से सम्बोधित किया था। गाँधी जी को देश हित में अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही विदेश में ‘आजाद हिंद फौज के प्रत्येक कार्य में हिन्दी का ही प्रयोग किया उसका प्रयाण गीत (मार्च पास्ट) भी ‘कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा यह जिन्दगी है कौम की कौम पे मिटाए जा यह सर्वविदित है कि ‘आजाद हिंद फौज’ में विभिन्न भाषा-भाषी होने के बाद भी ‘जय हिंद’ का परस्पर सम्बोधन तथा हिंदी में ही नारे ‘दिल्ली चलो, लाल किले पर तिरंगा, जय हिन्द आदि। बोध वाक्य नेता जी के नाम से जाने गए। वह भी गुजराती भाषी महात्मा गांधी की भांति भारत में बंगला भाषी नेता जी अ.मा. ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में गांधी जी की भांति हिंदी में ही हजारों लोगों को सम्बोधित किया।

आज हिंदी विदेशी मूल के अनेक साहित्यकार कवि मूल रचनाएं कर हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि में मील का पत्थर बन चुके हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कानपुर की मानस संगम’ संस्था में सैकड़ों विदेशी मूल के लोगों ने विगत 47 वर्षों में हजारों लोगों को उनके हिंदी प्रेम को प्रत्यक्ष रूप से देखा और सुना। हिंदी का इतना विराट स्वरूप हो चुका है कि हमें साहित्य के व्यापक इतिहास लिखने में विदेशों में रचे जा रहे हिंदी सम्मेलनों में तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन में इंग्लैण्ड के डॉ. मैकग्रेगर का हिंदी में कितना बड़ा उद्बोधन हुआ। यहां संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव श्री बान की मून के उन शब्दों को उद्धृत करना चाहूँगा जो 13 जुलाई, 2007 को राष्ट्रसंघ के मुख्यालयों में आयोजित आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहे थे ‘हिंदी एक मीठी भाषा है, जो दुनिया भर के लोगों को पास लाने का काम कर रही है। यह एक ऐसी भाषा है जो दुनिया भर की संस्कृतियों के बीच एक सेतु का काम करती है।’

अन्त में राष्ट्रकवि श्री दीन मुहम्मद ‘दीन’ को रेखांकित पंक्तियों में हिंदी प्रेमियों की भावना समाहित है-

किन्तु हमारी हिन्दी भाषा जन-जन की है भाषा।
अपने पैरों चलती आई किसकी करती आशा।।
अपनी माषा, अपनी संस्कृति की करना है रखवाली।
तभी हमारे मारत में आ पायेगी खुशहाली ।।

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