Monday, February 23, 2026

माइकल जैक्शन बनाम जनकवि प्रदीप

डॉ. बद्री नारायण तिवारी

इस समय इलेक्ट्रानिक मीडिया ने लोगों को पढ़ने तथा सुनने की प्रवृत्ति से अधिकांशतः वंचित सा कर दिया है। जहाँ एक ओर श्रुति (श्रवण) के माध्यम से सैकड़ों वर्ष सुनकर मस्तिष्क में स्मरण शक्ति का अद्‌भुत प्रभाव था उसे विज्ञान के कम्प्यूटर ने समाप्त करने का शुभारम्भ कर दिया, वहीं दूसरी ओर दूरदर्शन टी.वी की डिश संस्कृति ने पुस्तकों के पठन-पाठन को खत्म करने का माहौल निर्मित कर दिया है।

विगत दासता युग में होने वाले कार्यकलापों का मूल्यांकन होने से देश के विकास में सहयोग मिलेगा इतिहास से अपनी त्रुटियाँ दूर करने में सहायता मिलती है इतिहास केवल पढ़ने से ही नहीं, उसकी त्रुटिया दूर करके शिक्षा ग्रहण करने से रचनात्मक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है, इसलिए प्रथम स्वाधीनता के 1857 की क्रान्ति पर दो प्रमुख चर्चित ग्रंथों क्रांतिवारी विनायक दामोदर सावरकर कृत 1857 का प्रथम स्वतंत्र समर जो उनके लंदी प्रवास “इंडिया हाउस” में लिखा गया है। दूसरा कर्मवीर पं. सुंरदलाल कृत “भारत में अंग्रेजी राज 18 मार्च सन् 1929 ई. को 200 प्रतियों का प्रथम संस्करण प्रकाशित होते ही फिरंगी सरकार ने जब्त करने का इतनी सख्ती से आदेश पारित किया कि 1700 ग्राहकों के पते लगा-लगाकर समस्त देश में सैकड़ों तलाशियां ली गयी। जिनमें अनेक पुस्तकें उनके हाथ लग गई। इसके पश्चात् स 1937 के कांग्रेसी सरकार बनने पर कई प्रांतों में इस पुस्तक की जब्ती राजाज्ञा को समाप्त होते ही 10000 प्रतियां प्रकाशन की योजना कार्यान्वित हुई। महात्मा गांधी तो इस पुस्तक की जब्ती पर इतने उत्तेजित थे कि उन्होंने लोगों को यह सलाह दी कि ब्रिटिश सरकार के कानून तोड़कर इस पुस्तक के महत्वपूर्ण अंश को छापकर सार्वजनिक वितरण किया जाए और लोग जेल जायें। देश की स्वतंत्रता के पश्चात् केन्द्रीय प्रकाशन विभाग ने इसके तीन संस्करण जुलाई सन् 1960, अक्टूबर सन् 1963 तथा सितम्बर सन् 1967 में प्रकाशित किए।

वस्तुतः आजकल अंग्रेजी के दो शब्दों का अधिक प्रचलन है कि वह बड़ा ‘पॉलिटिशियन’ है अथवा ‘स्टेट्समैन’ है। दोनों में महान अंतर है। जैसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जिन्होंने अपने पत्रों मराठा तथा ‘केसरी’ के माध्यम से देश के स्वाधीन होने का शाश्वत गुरुमंत्र प्रदान किया। इसी पत्रकारिता लेखन में उन पर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध राजदोहात्मक मुकदमा चलाया और वर्मा के मांडले कारागार के सीखचों में बंद कर दिया था। महात्मा गांधी ने देश की स्वाधीनता को “स्वदेशी” आंदोलन से जोड़ने के लिए प्रतीकात्मक “विदेशी कपड़ों की होली” तथा “नमक” सत्याग्रह के आंदोलनों को चलाकर जन-जन तक पहुंचाया। ये “स्टेट्समैन” यानी दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे। दूसरे क्षणिक लाभ का नारा लगाने वाले “राजनेता” “पॉलीटिशियन” कहलाते हैं। इस समय इन्हीं राजनेताओं की अधिकता है। उनका हस उसी प्रकार होता है जैसे – सोवियत रूस में सत्ता परिवर्तन के पश्चात् वहां के चर्चित तानाशाह शासक स्टालिन की स्थापित मूर्तियां तोड़ी गयी और उनके नाम पर स्थापित महानगर “स्टालिनग्राड” नगर का नाम तक परिवर्तित कर दिया गया।

इसलिए इन दूरदर्शी राजनीतिज्ञों के विचार खोखले नारे न होकर “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, इसे लेकर रहेंगे” तथा स्वाधीनता का “स्वदेशी” आंदोलन मूलाधार है शाश्वत बोध वाक्य के रूप में मान्य हुए। इतिहास से शिक्षा ग्रहण करने के लिए अध्ययन किया जाता है जिससे भविष्य में पुरानी त्रुटियां पुनः न दोहराई जायें।

देश पर निःस्वार्थ भाव से मर मिटने वालों की विलुप्त होती स्मृतियों को संजोने हेतु उनकी प्रतिमाओं की स्थापना को कब्रगाह कहने की वृत्ति तथा विदेशी इतिहासकारों की दृष्टि से राष्ट्र से राष्ट्र पुरुष “शिवाजी महाराज” को पहाड़ी चरवाहा लुटेरा, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला, पं. राम प्रसाद “बिस्मिल” आदि को आतंकवादी, अमर अलिदानी नाना साबह की मुंह बोली बहिन वीरांगना अजीजन को रणचंडी न कहकर रंडी कहने वाले अपने देशवासियों को क्या कहा जाये? 1857 की क्रांति के 26 वर्षों के बाद ही पं प्रताप नारायण मिश्र ने सन् 1883 में अपनी चर्चाओं में अमर शहीद मैनावती की भी चर्चा की है। नाना साहब की तेजस्वी पुत्री मैनावती को जिसे फिरंगियों ने जिंदा जलाया था, उसे आधुनिकता के चश्मे से देखने वाले “तोता मैना का किस्सा” वाले काल्पनिक मिथक का रूप कहने लगे हैं। क्या उसी तोता मैना के नाम पर ही ऐतिहासिक बिठूर से नवाबगंज संपर्क मार्ग का नाम “मैनावती मार्ग” रखा गया है, जो इस समय क्रान्तिवीर नाना साबह की शहीद कन्या ‘मैनावती’ के नाम से है। देश में अब सर्वप्रथम दोनों बलिदानी वीरांगनाओं मैनावती तथा अजीजन की प्रतिमाओं की स्थापना ऐतिहासिक नानाराव पार्क “शहीद उपवन” कानपुर में स्थापित हो चुकी है। इसी प्रकार वर्तमान शहीद उपवन नानाराव पार्क स्थित ऐतिहासिक बलिदानी बूढ़े वट वृक्ष के सुरक्षात्मक उपाय जो रहे हैं. न किये जाते तो उसकी लकड़ियां जलाकर उस ऐतिहासिक शहीदी स्थल का नाम तक समाप्त हो जाता। उस बलिदानी बरगद स्थल का यह नयी पीढ़ी काल्पनिक कहकर उपहास उड़ाती।

आज देश को इतिहास से शिक्षा ग्रहण करने हेतु “सिपाही विद्रोह” या “गदर” के नार्मो को हटाकर उसे 1857 की क्रांति या भारत के “स्वातंत्रय समर” का नाम देने वाले सर्वप्रथम वीर सावरकर ही थे उनकी इस ऐतिहासिक कृति “1857 को स्वातन्त्र्य समर” को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आजाद हिंद फौज में “गीता” के समान अंग्रेजों से लड़ने वाले प्रेरक पुस्तक के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पर अब लगता है इन क्रांतिवीरों पर आधारित सत्यकथाएं, कहानियां या उपन्यास तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के धारावहिक (सीरियल) प्रसारित न होने से ये प्रेरक शलाका पुरुष की गुमनामी के अंधेरे में न खो जायें। अपने सीमित साधनों से जो संस्थायें या व्यक्ति उन स्मृतियों के जागरण हेतु विभिन्न प्रकार से सक्रिय रहे, उन सभी के प्रति नमन करता हूँ।

देश का जो माहौल चल रहा है, उसमें राष्ट्रीय कवि “बल्लभ जी” के जो तराने उस स्वाधीनता संग्राम को उद्वेलित करते थे।

जब रण करने को निकलेंगे, स्वतन्त्रता के दीवाने,
धरा धंसेगी, प्रलय मचेगी, व्योम लगेगा थर्राने।
बहिन कहेगी जाओ भाई, कीर्ति-कौमुदी बिखराना,
पुत्र कहेगा, पिता, शत्रु का झंडा छीन मुझे लाना।
स्वाभिमानी मां कह देगी, लाज दूध की रख आना
और कहेगी पत्नी, “प्रियतम, विजयी हो स्वागत पाना।”

उत्साही कवियों की कविता, शौर्य लगेगी उमगाने,
जब रण करने को निकलेंगे, स्वतंत्रता के दीवाने।
ऐसा आंर्तनाद होगा, इंगलैंड लगेगा दहलाने,
जब रण करने को निकलेंगे, स्वतंत्रता के दीवाने।

आजादी के आन्दोलन के दौरान स्वतन्त्रता की कीमत “वल्लभ जी” की रेखांकित पंक्तियों में समाहित है|

स्वतंत्रता का मूल्य प्राण है देखें कौन चुकाता है,
देखो कौन सुमन शैया तज कण्टक पथ अपनाता है।
गोली गलबाहों तजकर फांसी जिसको प्यारी हो।
उसी वीर की ओर देश अब अपने कर फैलाता है।
स्वतन्त्रता का मूल्य प्राण है देखें कौन चुकाता है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” के शब्दों में –

जला अस्थियां अपनी सारी, छिटकायीं जिनने चिंगारी,
जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल।
साक्षी है इनकी महिमा के सूर्य, चन्द्र, भूगोल खगोल।
कलम आज उनकी जय बोल।

ये पंक्तियां जो स्वतंत्रता संग्राम के समय की बलिदानी भावना को स्पष्ट कर रही है, किन्तु आज ठीक इसके विपरीत पाश्चात्य पॉप संगीत जो विलासिता को उकसाने वाले गायक माइकल जैक्सन के मुंबई आयोजन में लाखों रुपयों के टिकट लेकर अपनी वर्तमान मानसिकता को उजागर कर रही है। इतना ही नहीं प्रेरणादायी शाश्वत ‘कालजयी गीतों “आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की. इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है बलिदान की” और स्वाधीनता के बाद प्रसिद्ध गीत “ए मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’ जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी” का दर्द भरे गाने पर पं नेहरू से लेकर करोड़ों देशवासियों को झंकृत करने वाले गुमनामी के अंधेरे में पड़े गीतकार प्रदीप को विगत वर्षों में सिनेमा जगत का “दादा साहेब फालके” पुरस्कार प्रदान करके इतिश्री कर ली गयी। दूसरी ओर विदेशी पॉप गायक माइकल जैक्सन के सोने वाले तकिए के गिलाफ चादर की नीलामी में भारतीय नवयुवकों ने दासता की मानसिकता का नग्न प्रदर्शन करते हुए लाखों रुपये की नीलामी में उसे खरीदकर अपनी हीनता का परिचय दिया। वह पत्रों में भी चर्चित रहा। देश की खोखती होती संस्कृति को यदि न संजोया गया, हमारा देश चौराहे पर खड़ा है हां से सही रास्ता नहीं दिखाई पड़ रहा है। देशभक्ति या शहीदों को कब्रिस्तान कहने वाले, निजी स्वार्थ के चश्मे से देखने वालों की संख्या बढ़‌ती जा रही है।

इसी संदर्भ में एक घटना याद आ गई जब हिन्दी के भीष्म पितामह प‌द्मविभूषण पं. श्री नारायण चतुर्वेदी ने एक प्रेरणादायी सदा बहार फिल्मी गीत को अपने एक आलेख में लिखा वर्तमान समाज में व्यक्ति कितना बदल गया उसे पं. रामचन्द्र दुबे चर्चित उपनाम प्रदीप जी ने यथार्थ चित्रण करते हुए गीत लिखा है। उस गीत का प्रारम्भिक मुखड़ा “सूरज न बदला चाँद न बदला कितना बदल गया इन्सान…” अब भी सुनने पर मन झंकृत कर देता है। अभी भारत सरकार ने शहनाई सम्राट विस्मिल्ला खा का दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई वादन की उनकी अंतिम अभिलाषा को पूर्ण होने को स्वीकृति पत्र लेकर भारत के केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्री प्रकाश जायसवाल उनसे वाराणसी में भेंट कर प्रदान किया।

भारतीय संस्कृति में बच्चों के जन्म दिवस पर उनके उज्ज्वल भविष्य हेतु दीप प्रज्वलित कर प्रकाश दिवस के स्थान पर विदेशी पाश्चात्य नकल में लिप्त मैकाले शिक्षा से परिपूर्ण हम अपने बच्चों के जन्म दिवस को “हैप्पी बर्थ डे” में मोमबत्ती बुझाकर अंधकार दिवस के रूप में मनाकर उनका भविष्य भी अंधकारमय कर रहे हैं। आज सरकार और समाज दूरदर्शनी संस्कृति को पनपा रहे है। अब यह निर्णय आपको करना है कि देश को माइकल जैक्शन चाहिए या गीताकार प्रदीप जो अभी दिवंगत हुए हैं।।

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