डॉ. बद्री नारायण तिवारी
इस समय देश सांस्कृतिक आक्रमण के दौर से गुजर रहा है। क्षमतामयी कोई भी भाषा, किसी वर्ग या सम्प्रदाय की सीमा में नहीं बंधी होती। सामाजिक जीवन में अपने व्यवहार से अबाध गति से फैलती चलें जाती है। हमारे प्राचीन मनीषियों ने उचित ही कहा है “वाचामेव प्रसादेन लोक यात्रा प्रवर्तते। इदन्ध तमः कुत्स्तं जायेत भुवनत्रयाम्।” एक बोली लोक व्यवहार के रथ पर सवार होकर एक दिन वहाँ भाषा बन जाती या फिर जिसकी सहायक होकर भाषा की अभिवृद्धि होकर हाथ बटाती है। प्रत्येक भाषा का अपना एक उत्प या उत्स होते हैं, परम्पराएं होती हैं तथा बोलने वालों के प्रयोग उसे विस्तार प्रदान करते हैं। हमारी स्वाभाविक राष्ट्रभाषा हिन्दी है, जनभाषा है जो अपनी बहनें प्रादेशिक भाषाओं के साथ विलसती, खेलती चली आ रह है। स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी के तीक्ष्ण धार वाले अस्त्र का काम किया था। वह कोई 1947 के बाद प्रवाहित है हुई नहीं है और न ही 14 सितम्बर 1949 से भारतीय जन-जीवन को उसके व्यवहार के लिए समर्पित की हां हैं। तत्कानलीन संविधान सभा के विद्वानों ने देश की सम्पर्क भाषा हिन्दी को मान्यता प्रदान कराने में हिन्दीता क्षेत्रों के ही अधिकांश दूरदर्शी मनीषी थे।
इसी भावना से ओत-प्रोत तीन दशक पूर्व ‘रामकथा और मुस्लिम साहित्यकार’ के प्रथम खण्ड का प्रकाशन किया था। इसके पश्चात कई कृक्तियों का प्रकाशन किया, जिसे युवा विदुषी डॉ. माहे तिलत सिद्दीकी ने 360 पृष्ठों में उर्दू में अनुवाद कर प्रकाशित हो रहा है और साथ ही ग्वालियर से हिन्दी में “रामकथा और मुस्लिम साहित्यकार समग्र” मेजर राजेन्द्रनाथ मेहरोत्रा संपादक “विश्व हिन्दी” कर रहे हैं। यह इस परिवर्तन लहर का प्रभाव है। उस समय जो संकीर्णता के भाव कि हिन्दी हिन्दुओं की और उर्दू मुसलमानों की है राजनीति की प्रतिछाया के मनोभाव दूर हुए। लिपि भेद के कारण कुछ झुकाव अलग-अलग रहा हो किन्तु हिन्दी से सम्बद्ध तुर्क मुसलमान अमीर खुसरो ने फारसी का विद्वान होते हुए भी कहा था- “मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ और हिन्दवी में उत्तर देता हूँ।” यही ‘हिन्दवी’ अपभ्रंश होकर हिन्दी नाम से जनचर्चित हुई संस्कृत, फारसी, अरबी और तुर्की सहित कई भाषाओं के ज्ञाता अमीर खुसरो की पहेलियाँ और मुकरियाँ ‘ढकोसले’ लिखे और ‘खालिक बारी’ नामक पद्यबद्ध शब्दकोश भी बनाया। नये-नये प्रयोगों विधाओं को विधिता से सम्बद्ध अमीर खुसरो संभवतः सर्वप्रथम कवि हैं। जनसामान्य तक हिन्दी कविता को पहुँचाने वाले वे अग्रिम पंक्ति के शीर्षस्थ कवि है।
राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय आतंकवादी घटनाओं ने जनसामान्य में दहशत फैलाने से हमारी व्यवस्था जर्जर हो रही है। इस संक्रमण काल की चुनौती को रामनाम का जाप करने वाले कबीर को ये पंक्तियों- ‘प्रेम गली अति सौकरी, तामे दो ना समाय’, कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय।’ रोम-रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय’ ने प्रेमामृत का संदेश कितनी सरल भाषा में व्यक्त किया। इसके बाद भी जब राजनीति विषभरी साम्प्रदायिकता की भट्टी समय-समय पर सुलगा देती है, तब उससे भड़की हुई ज्वाला सदियों में कायम हमारे भाईचारे को कहाँ-कहाँ इतना जला देती है कि उसका जहरीला धुआँ काफी दिनों तक हमारे राष्ट्रीय आकाश में मँडराता रहता है। जैसे वर्तमान समय में अयोध्या राम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद के 6 दिसम्बर 1992 का प्रकरण। ज्वलन्त समस्या पर मुसलिम रचनाकारों में सर्वप्रथम जाने-माने क्रान्तिकारियों राष्ट्रीय शायर कैफी आजमी ने अपने मनोभावों को 6 दिसम्बर को मिला दूसरा वनवास मुझे” शीर्षक में व्यक्त किया-
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये।
रक्स ए दिवानगी आंगन में जो देखा होगा।।
6 दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा।
इतने दीवाने मेरे घर में कैसे आये।
पांव सरजू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नजर आये वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फिजा आयी नहीं रास मुझे
6 दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे।
इसी समस्या से व्यक्ति राष्ट्रीय कवि दीन मुहम्मद दीन ने किन शब्दों में चित्रित किया-
युग भ्रष्ट पथ पर तीव्रता से बढ़ रहा है।
धर्म- पथ नष्ट कर दुष्टता को पढ़ रहा है।
पूज्य प्रतिमाएँ भटकती फिर रही है पंथ में।
‘नर’ विषदन्त बन चन्द्रमा पर चढ़ रहा है।
धर्मार्थ वाहन लुंज पुंज हो रहा है।
उनकी तुम्हारी किसी की, इनको क्या।
स्वार्थ का वाहन नवदन्त हो रहा है।
बन्धुता विषाक्त-सी बन गई है।
मित्रता स्वार्थ में सन गई है।
भौतिकता के आवरण में फंसा मन।
मनुष्यता शैतान सी बन गई है।
दौन जी समस्या समाधान हेतु कहते हैं-
प्रेम से चलो, पाहन पिघल सकता है। धैर्य से चलो, दुःशासन हिल सकता है।
सत्य-अस्त्र-शस्त्र हस्त में रहे तेरे। नीति से चलो, नारायण मिल सकता है।
जब आक्रामकता शांत हुई और गंगा-जमुनी संस्कृति ने हिन्दू तथा मुसलमानों को अपनी-अपनी पद्धति में मानवता दी समन्वय का धरातल प्राचीन कवि रज्जब अली राम रसायन पीने की पंक्तियों जो इसी क्ति में। पाठक पढ़कर उसे आत्मसात करेंगे।
रामकथा में ‘गंगा’ जी पर सभी रचनाकारों ने विभिन्न भावों को रचनायें की हैं, किन्तु बहुमुखी प्रतिभा के धनी भारतीय समन्वयात्मक संस्कृक्ति के उन्नायक अब्दुल रहीम खानखाना का हिन्दी, अरबी, तुर्की, फारसी के साथ ही संस्कृत भाषा पर भी पूर्ण अधिकार था। संस्कृत में महाकवि रहीम की तीन रचनायें ‘खेटकौतुकन् त्रयस्त्रिंशद्योगावलि’, तथा ‘गंगाष्टकम्’ प्राप्त हैं। प्रस्तुत है श्रद्धेय रहीम की शाश्वत् कृक्ति गंगाष्टकम्। प्राप्त हैं। प्रस्तुत है श्रद्धेय रहीम की शाश्वत् कृति गंगाष्टकम्’। इसमें बड़ी तन्मयता और श्रद्धा के साथ गंगा जी के प्रति भक्ति भाव प्रकट करते हुए रहीम कहते हैं, “गंगे तुम्हारी महिमा अनन्त है। तुम्हारी महिमा से मरणोपरान भक्तजन विष्णु और शिव पद प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन तुम मुझे विष्णु रूप न बनाना क्योंकि विष्णु बनाने पा तुम चरणों से निकलने वाली नदी कहलाओगे, जओ उचित नहीं है। अतएव तुम मझे शिव रूप ही बनाना ताकि मैं तुम्हें आदर के साथ मस्तक पर धारण कर सकूँ।”
रहीम की संस्कृत में “गंगाष्टकम्” की प्रारम्भिक तथा अंतिम पंक्तियाँ यहाँ दृष्टव्य है-
अत्युतचरणतरंगिणि मदनान्तकमौलि मालती माले।
त्वयि तनुवितरणसमये हरता देया न मे हरिता।।
चिरं विरन्धि विष्णु पूज्य पाद वारि धारिणी। प्रतापकेतुपट्टिकाम्बुयष्टिका विहारिणी।।1।।
मुरारि पादसेविना विरामखान सुनूना।
सुभाष्टकं शुभं कृतं मया गुरु प्रभावतः ।।
पठछेविदं सदा शुचिः प्रभातकाल वस्तु यः।
लभेत वांछित फल स जाह्नवी प्रभावतः ।।2।।
वरिष्ठ पत्रकार तथा पूर्व अध्यक्ष कानपुर प्रेस क्लब के श्री सईदुल हसन नकवी के ‘मानस संगम’ पत्रिका में “राम का सेकुलर रूप” शीर्षक ओजस्वी लेख की कुछ पंक्तियाँ क्या कह रही हैं जिसे इन्होंने अपनी कलम से अनेक वर्ष तक ‘जागरण’ में रिपोर्टिंग की चर्चा भी की –
…..राम कथा को किसी वर्ग या धर्म विशेष की जागीर समझना रामचन्द्र जी के साथ बड़ी नाइन्साफी होगी। राम पूरी दुनिया और तमाम इन्सानियम के हैं।
रामायण में छुपे इन्सानी उसूलों के बेशुमार पहलुओं की गहराइयों तक पहुँचने की कोशिश में पढ़े-लिखे लोग तो उनकी व्याख्या करते हैं, लेकिन हजारों साल बीत जाने के बाद भी रामकथा के हर दिल में जीवित रहने का कारण उसका दर्द है जो दिलों में तड़प पैदा करता रहता है।
आतंकवाद के नाम पर युवकों को अपराध और अव्यासी के क्षणिक जीवन में झोंक देने की साजिश भारत में असफल रखने का श्रेय पूरी तरह से रामकथा को जाता है, जिसकी तड़प को भारतीय समाज से खुरच डालना किसी रावण या चंगेज खाँ के बस की बात नहीं रह गई है।
जुल्म और जालिम से नफरत पर आधारित भारतीय समाज की यह कशिश ही थी जिसे महसूस करके हुकूमत परस्त जैहनियत से तंग अरब देशों से सूफियों ने राम को धरती की इन्सानियत के प्रचार-प्रसार के लिए उस समय चुना था, जब यहां न कोई मुस्लिम हुकूमत थी और न बादशाहत थी।
रामकथा जिन्दगी के अनगिनत रहस्यों को समेटे ऐसा अध्यातम है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता अध्यात्म का सम्बन्ध दिल से है।
तंग नजर लोग विश्व बन्धुत्व के पैगाम को या तो समझ नहीं पाते या फिर जानबूझकर उसका जिक्र नहीं करते ‘मानस संगम’ के शुरू के पाँच साल की रिपोर्टिंग एक लोकप्रिय दैनिक हिन्दी अखबार के लिए मैंने ही की थी, इस पर मुझे गर्व है।”
रामभक्त मुस्लिम आशु कवि श्री अब्बास अली खाँ ‘वास’ की एक घटना याद आ गई जो ‘चित्रकूट रामायण मेले’ की वापसी पर मेरे आवास पर आकर सदैव भी भाँति रुके। ‘वास’ जी ने रामायण मेले के समारोह में आयोजित मंच से उतरने पर अपनी चप्पल न पाये जाने पर बेचारे नंगे पैर आवास स्थल तक गये।
दूसरे दिन की रोचक घटना का वर्णन करते हुए बताया कि “जब मुझे कविता पाठ के लिए बुलाया गया तब मैंने कहा कि पहले ‘मेरी आत्म-पीड़ा “शीर्षक कविता सुन लीजिए। इसके बाद श्री राम पर सुनाऊँगा मंचासीन लोगों की अनुमति से ‘वास’ जी ने रात में लिखे गये दोहे प्रस्तुत किये –
बिना परख-पहचान के अवध निकट का जान।
किसी भरत ने ले लिया, ‘वास’ मेरा पद-त्रान।।
चित्रकूट की यह रही परम्परा प्राचीन।
यहाँ रहे भगवान भी पद-पादुका विहीन ।।
इन पंक्तियों में अपनी आत्म बीती व्यथा-कथा को चित्रकूट की माला में कितने भावपूर्ण सुन्दर शब्दों में पिरोया है। काश। आज के राजनीति के चश्में से देखने वाले सियासत बाज इतने हृदय स्पर्शी भावों को समा सकें।
रामकाव्य के कालजयी महान संतकवि तुलसी के समकालीन शैव-वैष्णवों का द्वन्द चरम सीमा पर होने से वैष्णव-भक्त तुलसी ने ललकारते हुए कहा कि ‘जो शिव से दोह करता है और अपने आपको मेरा भक कहता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पा सकता। शंकर से विमुख होकर जो मेरी भक्ति की कामन करता है, वह नरकगामी, मूख और अल्पबुद्धि है।’
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।
संकर विमुख भगति चह मौरी। सो नारकी मूढ़ मति मोरी।।
यों सम्प्रदायों में विभाजन करने वालों ने पूर्व में भी कहा और आज भी कह रहे हैं कि कबीर नानक के राम तुलसी के राम अलग हैं, किन्तु निराकार या अवध नंदन साकार राम रघुकुल शिरोमणि हैं। इन दोनों संतें को अनन्त ‘ब्रह्म’ के अवतार वाले नामों से भी परहेज नहीं तभी कचीर कहते हैं-
हरि मोरा बीर माई, हरि मोरा पीव।
हरि बिनु सहि न सकै मोरा जीव।।
दूसरी ओर नानक ने गाया –
संग सखा सब तहिलज गए, कोऊ न निभयो साथ।
कह नानक इस विपद में, एक टेक रघुनाथ ।।
यी वर्तमान समय में ‘रामधुन’ को एकता का संदेशवाहक बनाया एक निहत्थे अस्त्र-शस्त्र का निषेध करने वाला महात्मा गाँधी जी नित्य प्रार्थना सभा में गाते थे-
रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम।
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान।।
ये पंक्तियाँ देश विभाजन में भड़के दंगों की आग को बुझाने हेतु अपनी रामधुन को जीवन के अंतिम बलिदान दिवस तक जीवंतता प्रदान की थी। इस समय गोधरा अक्षरधाम की वीभत्स घटनाओं के अंधेरे में भी उजाले की किरन फूटती है। क्या हमउसकी प्रतीक्षा ही करेंगेया स्वयं एक दीप जलायेंगे? वस्तुतः परीक्षा की इस नाजुक घड़ी में याद आ रही है शायर हरमतुल इकराम की रेखांकित पंक्तियों जो तमाम आतंकवादी घटनाओं की हताशाओं, अंधेरों और झंझावातों के बीच आशा का दीपक जलाया जा सकता है –
नाम तुलसी का है, लिखते दोये रामायण, रूह बनास के शोलों में नुमू पाती है
खेंच दो खाके बियााँ पे लबों की रेखा, अश्के यकदाना सी लरजा है अकेली सीता।
इन आँधियों में बशर मुसकरा तो सकते हैं, सियाह रात में सम्ए जला तो सकते हैं।
वस्तुतः किसी कवि की ये पंक्तियाँ वर्तमान समाज के यथार्थ को चित्रित कर रही हैं-
कोई न किसी को पहचाने, लगते जब जाने अनजाने,
भौतिक-मानव का विकास तभी, सचमुच का सत्यानाश तभी।
ऐसे समय लोकप्रिय नवगीतकारों के स्वर्णिम कलश उमाकांत मालवीय की हृदयंड्ङ्गम् करने वाली परिणय पूर्ण की मंगलकामना ‘राम’ की नहीं ‘रामकथा’ की महत्ता को शाश्वत आयु की मंगलकामना से की है-
नवदम्पती को, राम की नहीं, रामकथा की आयु मिले
उनका हर दिन राम की ऊष्मा और गन्ध से भीगा रहे।
अब्दुल रहीम खानखाना जो रहीम नाम से अति चर्चित हैं। तुलसीदास जी के घनिष्ठ मित्रों में थे। तत्कानलीन मुगल शासन में देश के बजीरे आजम एवं सेनापति भी थे।
जब दिल्ली में बादशाह ने नाराज होकर उनको एक ढके हुए बाल में एक तोहफा भेजा। उस थाल के ढके कपड़े उठाहर ज्यों ही रहीम ने अपने लड़के का कटा सिर खून से भरा थाल देखते ही समझ गए कि अब मेरी बारी है। वह तत्काल राजधानी दिल्ली त्याग कर अपने परम मित्र तुलसी के पास चित्रकूट पहुँच गये। वहाँ तुलसी की रामकथा सुनते और अपनी कलम से नीति वाक्यों को अपनी रचनाओं में लिखा। उसमें ‘चित्रकूट’ का कितना यथार्थ चित्रण करते लेखनी चलाई कि वह पंक्तियाँ-
चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस, जापर विपदा परत है, वह आवत यहि देस।।
चित्रकूट के कण-कण देवालयों में सैकड़ों वर्षों बाद भी गूंज रही। श्री राम ने चौदह वर्षों के वनवास में बारह वर्ष तक इसी चित्रकूट में निवास किया था। मानवतावादी, क्रान्तिदर्शी तुलसीदास जन-कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। राजनैतिक क्षेत्र के युग पुरुष महात्मा गाँधी ने उनके द्वारा चित्रित रामराज्य के आदर्श को अपनाया। तत्कालीन पण्डित समाज ने धर्माचार्यों और साधु सन्यासियों ने उनका उत्पीड़न जीवन भर किया। इसका मुख्य कारण अपने समय के सब निहित स्वार्थों का विरोध क्योंकि तुलसदीस का जीवन एक ध्येयवादी सुधारक का जीवन है।
अन्त में मैं सुविख्यात राष्ट्रीय शायर नजीर बनारसी की देश के प्रथम राष्टपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा राष्ट्रपति भवन में मुलसी जयन्ती पर चर्चित पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करता हूँ। “ऐ भारती तहजीब के जीवन दाता, धरती के मुकद्दर को संवारे तुलसी तुलसी पे तो लिख के यहाँ तक पहुँचा, श्री राम ये लिक्खूँ तो कहाँ तक पहुँचू।।”
