प्रखर श्रीवास्तव
संपादकीय निदेशक, जनमानस न्यूज़
आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण महादेवी वर्मा को आधुनिक गौरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती भी कहा है।
महादेवी वर्मा काव्य मंचों पर कविता पढ़ने के अतिरिक्त भी कानपुर के तमाम आयोजनों में शिरकत करने कानपुर आया करती थी। कानपुर में मानस संगम नामक अंतराष्ट्रीय साहित्यिक संस्था के आयोजन में उन्हें एक दिन के लिए आना था और वो आई भी मगर शिवाला प्रांगण में आयोजित उस कार्यक्रम की बानगी और डॉ बद्री नारायण तिवारी जी का आथित्व और साहित्यिक चर्चाएं उन्हें इतनी भाई कि एक दिन की जगह वो तीन दिन रुकी रहीं। उन्होंने संस्था प्रमुख बद्री नारायण से व्यंग में कहा भी था कि “आप अपने पिटारे में इतने साहित्यिक साँपो को कैसे रखते हैं ?” उन्होंने उल्लेख भी किया कि इस समारोह में मुझे बार बार चित्रकूट की याद आती रही….
महादेवी की काव्य रचना की मजबूती का एक कारण यह भी था कि महादेवी ने स्वतन्त्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। उन्होने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल ब्रजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया।
संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य की भी बेहतरीन समझ थी। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरुआत की और अन्तिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रही। उनका बाल-विवाह हुआ परन्तु उन्होंने अविवाहित की भाँति जीवन-यापन किया। पतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थी। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति अब भी प्रकाशमान है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप मैं वे जीवन भर पूजनीय बनी रहेगी, वे पशु पक्षी प्रेमी थी गाय उनको अति प्रिय थी। महादेवी का जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके परिवार में सात पौड़ियों के बाद पहली बार पुत्री का जन्म हुआ था। अतः बाबा बाबू बोंके बिहारी जी हर्ष से झूम उठे और इन्हे घर की देवी – महादेवी मानते हुए पुत्री का नाम महादेवी रखा। उनके पिता श्री गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे। उनकी माता का नाम हेमरानी देवी था। हेमरानी देवी बड़ी धर्म परायण, कर्मनिष्ठ, भावुक एवं शाकाहारी महिला थी।
महादेवी वर्मा के मानस बंधुओं में सुमित्रानन्दन पन्त एवं निराला का नाम लिया जा सकता है, जो उनसे जीवन पर्यन्त राखी बंधवाते रहे। निराला जी से उनकी अत्यधिक निकटता थी, उनकी पुष्ट कलाइयों में महादेवी जी लगभग चालीस वर्षों तक राखी बांधती रहीं |
महादेवी जी की शिक्षा इन्दौर में मिशन स्कूल से प्रारम्भ हुई साथ ही संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापकों द्वारा घर पर ही दी जाती रही। बीच में विवाह जैसी बाधा पड़ जाने के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने 1919 में क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगी। 1921 में महादेवी जी ने आठवी कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यहीं पर उन्होंने अपने काव्य जीवन की शुरुआत की 1932 में जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सस्कृत में एम.ए. पास किया तब तक उनके दौ कविता संग्रह नीहार तथा रश्मि प्रकाशित हो चुके थे।
