लेफ्टीनेन्ट मानवती आर्या की कलम से
(आजाद हिन्द फौज-लक्ष्मीबाई रेजीमेन्ट)
कानपुर के प्रमुख नागरिकों में मौन साधक राम भक्त बदी नारायण तिवारी जी अपनी प्रगाढ़ राम-मक्ति के साथ देश-भक्ति जन-सेवा, राष्ट्रभाषा हिन्दी साहित्य की सेवा तथा राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की दिशा में भी विशेष रूप से सक्रिय है। विशुद्ध भारतीय ढंग का सादा जीवन और उच्च विचार, दानशीलता तथा अतिथि सत्कार इनकी पहचान है। ये अपनी राम भक्ति को, कतिपय अन्य तथा कथित राम भक्तों की तरह विग्रहकारी रुख अपनाये बिना, समन्वयकारी रूप प्रदान करते हैं और अपने आदर्श संत तुलसीदास के कथनानुसार सब को सियाराम मय देखते हैं। तभी तो आपके मानस-संगम के कार्यक्रमों में हम विभिन्न धार्मिक मतों, सम्प्रदायों, देशों और जातियों के लोग एक मंच पर दिखाई देते हैं। तिवारी जी के सम्बन्ध में मुझे संक्षेप में कुछ लिखने को कहा गया है. तो मेरे सामने यह पश्न खड़ा हो गया है कि ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में में संक्षेप में क्या लिखूँ ?
मैं यहाँ उनकी सज्जनता, संवेदनशीलता और उदारता का अनुभूत उदाहरण प्रस्तुत कर रही हूँ। 28 दिसम्बर 2004 की बात है, ‘सुनामी तूफानी’ के कारण दक्षिण में हुई भयानक तबाही से पीड़ित लोगों की सहायतार्थ लोक सेवक मण्डल के दीपक मालवीय व अन्य युवा साथियों को लेकर एक तदर्थ समिति गठित करके मैं आवश्यक सहायता सामग्री इकट्ठी करने हेतु निकल पड़ी थी। 2 जनवरी 2005 को सहयोगियों के साथ सहायता सामग्री लेकर चैन्नई जाने के लिए रेलवे आरक्षण भी करा लिया था। अतः समय बहुत कम था। दो दिन की दौड़ धूप में जो कुछ जुट सका था वह बहुत कम होते के कारण परेशानी का अनुभव हो रहा था।
यातायात के निजी साधन का अभाव होते हुए भी इस वृद्धावस्था में मैं दो युवा साथियों को लेकर शहर की धूल छानती हुई जब याचक बनकर बदी नारायण तिवारी जी के घर जा पहुँची तो उन्हों प्रसन्नतापूर्वक हमारा स्वागत व आवभगत करते हुए कहा, “इस सहायता कार्य में सहयोग देने के लिए में किसी विश्वसनीय माध्यम की खोज में था। आपके निकल पड़ने से हमारे सहयोग का सही उपयोग सुनिश्चित हो गया। फिर 1000/- रुपये नकद मुझे देकर कहा यह रकम संग्रहार्थ आपके यातायात पर खर्च किये जाने के लिए दे रहा हूँ सहायता सामग्री अपने क्षेत्र से इकट्ठी करके और पैक कराके आपको तीन दिन के अन्दर मिल जायेगी आप पहली जनवरी को सामान उठवा ले जाय।”
निश्चित तिथि पर मैं दीपक मालवीय, नौशाद आलम व समरेश राय को लेकर वहाँ पहुँची तो देखा के उनके द्वारा संग्रह करायी गयी सहायता सामग्री कपड़े, अनाज, बर्तन अन्य खाद्य पदार्थ व विस्थापितों के आवश्यकता के समान दर्जनों पार्सल में पैक करा कर सूची तैयार कराने में उनके सुपुत्र मुकुल जी कई कर्मचारियों के साथ व्यस्थ हैं। और उनका विशाल प्रांगण अच्छा खासा माल गोदाम बना हुआ है। लगभग एक ट्रक सामान उनकी ओर से भेजे जाने के लिये तैयार रखा है।
मुझे उनके उस अप्रत्याशित वान सामग्री को देखकर जितना संतोष हुआ था उससे अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि उनके सुपुत्र मुकुल जी भी जनसेवा में बढ़ चढ़ कर संलग्न हैं। आज के भौतिकवादी युग में इस तरह के कामों में विरले ही पिता को पुत्र का सहयोग मिलता है। बद्रीनारायण तिवारी जी ने अपने बाद भी अपनी उदार परम्परा को कायम रखने की व्यवस्था कर रखी है. यह बड़े हर्ष की बात है|
