डॉ. सैय्यद महफूज हसन रिजवी ‘पुंडरीक’
आज से लगम 425 वर्ष पूर्व महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना करके राम कथा के माध्यम से विश्व मानवता की एक ऐसी आचार संहिता भेंट की, जिसे प्रभावित हुए बिना कोई भी सहृदय व्यक्ति नहीं रह सकता। वास्तव में में तुलसी ने श्री राम भद्र के उस उदात्त, निश्चल, निष्कलंक, सर्वधर्म-समभाव-संचालित, विवेकशील, न्यायप्रिय एवं आदर्श चरित्र को व्यक्त किया है जो देश. काल, जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय से परे, जीवन के शाश्वत मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है, एक ऐसा चरित्र – जिसकी सामान्य रूप से विश्व को और विशेष रूप से भारत का आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप इस अद्वितीय ग्रन्थ की छाप विश्व के अनेक विद्वानों लेखकों, घार्मिकों एवं कवियों आदि के दिलों पर बहुत गहरी पड़ी, विशेष रूप से भारतवर्ष के सभी जाति और धर्मों में विश्वास करने वाले हिन्दी एवं हिंदीतर भाषा-भाषियों की तुलसी मानस और रामकथा की दिव्यता एवं सार्वभौमिकता ने आकृष्ट किया। परिणामस्वरूप तुलसी किसी धर्म अथवा सम्प्रदाय विशेष के कवि न होकर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सरीखे अनेकानेक मिर्मावलंबियों के कंठहार बन गए और तुलसी के राम एक आदर्श एवं लोकप्रिय चरित्र।
मानस के प्रणयन के चार सौ साल पूर्ण होने पर वर्ष 1969 से देश-प्रदेश में श्री गोरेलाल शुक्ल के संयोजकत्व में मानस चतुश्सती समिति ने भोपाल में अनेक आयोजन किये। इस समिति ने तो मानस प्रशिक्षणार्थ अनेक स्थानों पर शिविर भी लगाए। राष्ट्रीय रामायण मेला प्रतिष्ठान की श्री चित्रकूट धाम में त्थपना की गई, श्री गोपालकृष्ण करवारया की अध्यक्षता और प्रोफेसर बाबू लाल जी गर्ग के संयोजकत्व में इस संस्था ने अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम किये। इस संस्था द्वारा श्री रामकथा को अखिल भारतीय स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। देश के कोने-कोने में जितनी भी भाषाओं में इस कथा का प्रणयन किया गया है उनके अधिकारी विद्वान वर्ष में एक बार इस मंच पर तब से आज तक एकत्रित होते आ रहे है। वर्ष 72 से 85 तक प्रत्येक वर्ष मुझे भी उक्त मंच पर अपने विचार रखने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा।
श्री प्रभूदयाल झुनझुनवाला और श्री पुरुषोत्तम झुनझुनवाला के सत्प्रयासों से वाकुलिया जिला सिंहभूमि, बिहार में मानश चतुश्शती के भव्य कार्यक्रम आयोजित हुए। इसी तारतम्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी आकर जुड़ती है ‘मानस चतुश्शती समारोह समिति, कानपुर की, जिसके संस्थापक और संयोजक कानपुर महानगरी * के प्रतिष्ठित व्यक्ति और परमदेश भक्त, गुण-ग्राही साहित्यिक चेतना से परिपूर्ण अनन्य रामभक्त और सरस्वती-सुजन श्री बद्री नारायण जी तिवारी थे। यह इस संस्था का अनन्य सौभाग्य था कि इसे युग डुलसी, रामकथा के अद्वितीय विद्वान पंडित रामकिंकर जी उपाध्याय का एक संरक्षक के रूप में आशीर्वाद प्राप्त था और अद्यावधि प्राप्त है।
तिवारी जी से मेरा परिचय बड़े ही नाटकीय बंग से हुआ था जिसका विस्तृत उल्लेख मैंने अपनी पुस्तक गोस्वामी तुलसीदास और मैं में किया है। मुझे याद है 28 दिसम्बर सन 1972 की वह शाम जब के निमंत्रण पर मैं कानपुर पहुंचा और शिवाला के प्रांगण में बहमति अलकृत एव गरिमा मडित मंच के गुप्त पार्षद से नैकटय स्थापित हुआ राष्ट्रकवि स्व. सोहनलाल द्विवेदी के आशीर्वचनों की फुहार में स् प्राप्त हुए। यही प्रथम बार मेरी मेट सत सरीखे श्री तिवारी से हई झंडागान के रचयिता स्वस्थान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तथा पूज्यवाद गुरुवर पंडित रामकिंकर जी उपाध्याय के निकट से नहीं प्राप्त हुए बल्कि उनके बरण स्पर्श करने का सुयोग भी प्राप्त हुआ।
कानपुर का यह मंच अपने आप में मुझे बहुत ही अदभुत सा लगा। इस मंच पर केवल भारत के विद्वान नहीं थे बल्कि रूस, जापान, मारीशस गुयाना, सूरीनाम तथा मलेशिया जैसे देशों के हिन्दी विद्वान तथा तुलसी-मानस पर साधिकार बोलने वाले वक्ता वृन्द विद्यमान थे। इस मच पर केवल हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले ही नहीं थे बल्कि इस्लाम, क्रिस्चन, बौद्ध और जैन धर्मावलंबी विद्वान भी सुशोभित के रहे थे। यह मच मुझे उस गुलदस्ते जैसा लगा जिसमें नाना रंगों तथा मांति-मांति की मीनी-भीनी गव ते युक्त फूलों को बहुत ही कलात्मक ढंग से सजाया गया था। लगता था इन्वधनुष उतर आया है इस नंब पर अथवा किसी कुशल गधी ने नाना प्रकार के इत्र उड़ेल दिया हो इस विशद मंच-मात्र में, जिसने नानात्व में एकात्मकता का रूप धारण कर लिया है. मुझे तो यह मच भारतीय संस्कृत की मूक व्याख्या जैसा लगा यही प्रथम बार मुझे प्रातः स्मरणीय परमपूज्य किंकर जी की गंभीर, उदार, नीर-कीर विवेक संवलित व सारगर्मित वाणी का मी श्रवण लाभ प्राप्त हुआ। आचार्य श्री किंकर जी को सुनने के बाद मैंने मन ही मन में उन्हें अपना गुरू स्वीकार कर लिया था। अनेक वर्ष तक मेरी स्थिति एकलव्य जैसी रही, किन्तु पूज्य श्री किंकर जी को दोणाचार्य कहने का दुस्साहस मैं कभी नहीं कर सकता। क्योंकि उनके औवार्यपूर्ण व्यवहार से यह आशा की ही नहीं जा सकती के वे कभी गुरुदक्षिणा में मुझसे दाहिने हाथ का अंगूठा माग लंग यद्यपि एकलव्य की प्रत्यन्या और पुंडरीक की लेखनी में अधिक वैषम्य नहीं है।
समितियों का गठन प्रायः किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है और उस की पूर्ति के उपरात इस प्रकार की समितियाँ मंग कर दी जाती है। चूंकि कानपुर की मानस चतुश्शती समारोह समिति मी विशद स्तरीय मानस संबधी कार्यक्रमों के आयोजित करने के उद्देश्य से गठित की गई थी अतः 28-29 दिसम्बर, 1972 को अपने आप में भव्य समापन समारोह के साथ इस समिति का भग है जाना भी नितांत स्वाभावित था।
समिति तो भंग हो गई, किन्तु इस समिति द्वारा आयोजित तुलसी मानस, हिंदी आदि संबंधी कार्यक्रमों को जी देश-विदेश के विद्वानों एवं कापुर के प्रतिष्ठित नागरिकों के साहित्य प्रेतिर्या एवं रामकथा के आदर्श को ग्रहण करने वालों ने मंथन किया तो सांस्कृतिक सामरस्य का एक अमृत-कुम निकल आया। प्राय समी विद्वानों का यह विचार था कि इस प्रकार के आयोजनों को बन्द नहीं होना चाहिए। सच बात तो यह है कि श्री बदीनारायण तिवारी ने कानपुर के इस मंच से महाकवि तुलसीास के उस चित्र का अनावरण किया था जो देश, काल और धर्म की सीमाओं से परे था, यही नहीं, स्व. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह स्थापना की भारतीय संस्कृति की विशेषता ही समन्वय में है को ही तुलसी दर्शन का नामिक बना दिया था।
किसी एक विशिष्ठ समुदाय के लिए राम कथा का धार्मिक महत्व हो सकता है किन्तु सभी भारतवासियों के लिए तो इसका सबसे अधिक सांस्कृतिक महत्व ही है। चूंकि धर्म को अब सम्प्रदाय के रूप में संकीर्ण करके समझा जाने लगा है अतः संस्कृति का फलक अत्यंत व्यापक हो गया है। धर्म को यदि इसके वास्तविक अर्थों में ग्रहण किया गया होता तो यह संस्कृति का पर्याय ही ठहरता। सम्पूर्ण रामकथा के अवगाहन करने से ज्ञात होता है कि श्री रामचन्द्र किसी धर्मगत सम्प्रदाय के प्रतिनिधि नहीं थे बल्कि वह भारतीय संस्कृति की थाती थे। श्री रामभद्र के इसी रूप को श्री तिवारी ने अपने चतुश्शती संबंधी समारोहों में प्रदर्शित और प्रचारित किया था जिससे विश्व बन्धुत्व के साथ ही साथ राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। श्री रामभद्र ने जीवन में सबसे अधिक महत्व प्रेम को दिया है, जिसका प्रमाण शबरी नमक भीलनी के अतिशय को स्वीकार करने के उपरांत श्री राममद द्वारा की गई यह स्थापना है कि –
सुन भामिनि यहि मोकर बाता।
मानहुं एक मगति कर नाता।।
पिछले दो दशकों से देश में जिस प्रकार के धर्मान्धता ग्रसित साम्प्रदायिक उन्माद का वातावरण, राजनैतिक स्वार्थ की आवश्यकताओं को देखते हुए बनाया जा रहा है उस पर अंकुश लगाने के लिये रामकथा के उस रूप को प्रदर्शित और प्रचारित करने की आवश्यकता थी जिसका प्रस्तुतीकरण श्री तिवारी ने अपने मंच से किया था। अतः सभी लेखकों एवं विद्वानों के आग्रह को स्वीकार करते हुए श्री बदी नारायण तिवारी ने ‘मानस-संगम’ नामक संस्था की। 1973 में स्थापना की और उसी वर्ष से शिवाला के उसी प्रांगण में जहाँ मानस चतुश्शती समापन समारोह सम्पन्न हुआ था, मानस-संगम समारोह होने लगा। मानस-संगम की स्थापना के बाद इस संस्था ने अनेक रचनात्मक कार्यों को अपने हाथ में लिया जो – राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के कार्य सिद्ध हुए, इनमें से कुछ का उल्लेख निम्नानुसार है –
1. तुलसी-मानस अथवा रामकथा पर आधारित ग्रन्थों के लेखकों एवं कलाकारों को सम्मानित किया जाता है-इस अंगखला के अन्तर्गत मानस मर्मज्ञ पं. रामकिंकर उपाध्याय, श्री अमृतलाल नागर (लखनऊ), सुश्री नमिता चटर्जी (कलकत्ता), डॉ. नरेन्द्र कोहली-नई दिल्ली, श्री गोपाल उपाध्याय (लखनऊ), श्री लक्ष्मी शंकर मिश्र ‘निशंक’ (लखनऊ), डॉ. माणध (इम्फाल), डॉ. विजय भट्ट (बम्बई), डॉ. रामलखन सचान (कानपुर), व्यंग्य चित्रकार श्री अंकुश, आलोक, गोविन्द तथा सादिक आदि को उनकी साहित्यिक एवं कला संबंधी कृतियों पर सम्मानित किया जा चुका है।
